वीरेंद्र-अनुपमा के बाद अब आनंद की बारी?

हरीश रावत की खुली पैरवी से कांग्रेस में परिवारवाद बनाम राजनीतिक विरासत की बहस तेज

देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एक बार फिर सुर्खियों में हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले रावत ने अपने छोटे बेटे आनंद रावत को कांग्रेस का टिकट दिलाने की इच्छा सार्वजनिक कर दी है। खास बात यह है कि उन्होंने आनंद को ऐसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाने की बात कही है, जहां कांग्रेस लंबे समय से जीत दर्ज नहीं कर पाई है। हरीश रावत की इस खुली पैरवी ने कांग्रेस के भीतर परिवारवाद, राजनीतिक विरासत और संगठन के सामान्य कार्यकर्ताओं के अधिकार को लेकर बहस तेज कर दी है।

हरीश रावत का कहना है कि उनकी दिली इच्छा है कि उनकी ‘उत्तराखंडियत’ की सोच और उत्तराखंड के साथ उनके रिश्ते को आगे बढ़ाने वाला कोई व्यक्ति सामने आए और उन्हें इसकी संभावना अपने बेटे आनंद रावत में दिखाई देती है। यही बयान अब 2027 की कांग्रेस की टिकट राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।

एक परिवार, तीन चेहरे और अब तीसरे बेटे की दावेदारी

हरीश रावत परिवार पहले से ही उत्तराखंड की सक्रिय राजनीति में मौजूद है। उनके बड़े बेटे वीरेंद्र रावत 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से कांग्रेस प्रत्याशी रह चुके हैं। हालांकि उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। वहीं उनकी बेटी अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा सीट से कांग्रेस की विधायक हैं।

अब छोटे बेटे आनंद रावत के लिए विधानसभा टिकट की पैरवी सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या हरीश रावत अपनी राजनीतिक विरासत को धीरे-धीरे परिवार की अगली पीढ़ी को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं?

परिवारवाद या राजनीतिक अधिकार?

हरीश रावत की मांग के दो पहलू सामने हैं। आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस में हजारों कार्यकर्ता वर्षों से संगठन के लिए संघर्ष करते हैं और चुनावी टिकट की उम्मीद लगाए रहते हैं। ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता के बेटे को राजनीतिक विरासत और पिता के प्रभाव के आधार पर टिकट मिलना परिवारवाद की बहस को जन्म देता है।

वहीं आनंद रावत के समर्थकों का तर्क है कि किसी राजनीतिक परिवार में जन्म लेना अपने आप में राजनीतिक योग्यता का प्रमाण तो नहीं है, लेकिन यह किसी व्यक्ति के चुनाव लड़ने के अधिकार को भी खत्म नहीं करता। यदि आनंद ने संगठन में काम किया है, सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं और किसी क्षेत्र में अपना जनाधार बनाया है, तो उनकी दावेदारी का मूल्यांकन भी अन्य नेताओं की तरह राजनीतिक काम और स्थानीय स्वीकार्यता के आधार पर होना चाहिए।

सवाल टिकट का नहीं, कसौटी का है

असल सवाल यह नहीं है कि आनंद रावत को चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि कांग्रेस टिकट का आधार क्या तय करती है?

यदि टिकट का आधार संगठनात्मक काम, स्थानीय जनाधार, जनता के बीच सक्रियता और चुनावी क्षमता है तो आनंद रावत की दावेदारी का भी इन्हीं कसौटियों पर मूल्यांकन होना चाहिए। लेकिन यदि किसी बड़े नेता की राजनीतिक हैसियत ही टिकट का प्रमुख आधार बनती है, तो इससे उन कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष पैदा हो सकता है जो वर्षों से पार्टी के लिए काम करते हुए टिकट की उम्मीद रखते हैं।

हरीश की राजनीति और विरासत का सवाल

हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में लंबे समय से एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर मुख्यमंत्री की कुर्सी और केंद्र की राजनीति तक पहुंचा। अब उम्र के इस पड़ाव पर उनके सामने सबसे बड़ा सवाल केवल सक्रिय राजनीति का नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक विचारधारा और उत्तराखंडियत की विरासत को आगे बढ़ाने का भी है।

इसी संदर्भ में आनंद रावत का नाम सामने आना महज एक टिकट की मांग से आगे की राजनीतिक चर्चा बन गया है।

2027 में कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण चुनाव होगा। पार्टी के सामने सत्ता में वापसी की चुनौती है और इसके लिए उम्मीदवार चयन बेहद अहम होगा। ऐसे में एक ओर परिवार से जुड़े दावेदार होंगे तो दूसरी ओर लंबे समय से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

आनंद रावत की दावेदारी पर अंतिम फैसला कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व और पार्टी की चुनावी प्रक्रिया करेगी। लेकिन हरीश रावत द्वारा बेटे के लिए खुलकर टिकट की इच्छा जताने के बाद इतना तय है कि 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस में ‘परिवारवाद बनाम राजनीतिक विरासत’ की बहस और तेज होने वाली है।

अब निगाह इस बात पर है कि कांग्रेस आनंद रावत की दावेदारी को किस कसौटी पर परखती है—पारिवारिक विरासत के आधार पर या उनकी अपनी राजनीतिक जमीन के आधार पर।

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