भीमावाला नौघाट पुल के पास नदी के बीचोंबीच बनाया अस्थायी मार्ग, दोपहिया वाहनों से प्रति चक्कर रुपये वसूलने के आरोप
निर्माण की अनुमति किसने दी? खनन, वन, सिंचाई और राजस्व विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल; जिला प्रशासन से संयुक्त जांच की मांग
विकासनगर। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर भीमावाला स्थित नौघाट पुल के समीप यमुना नदी के भीतर बनाया गया अस्थायी रास्ता इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। दोनों राज्यों को जोड़ने वाला नवनिर्मित पुल अभी पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है, लेकिन इसके समीप यमुना नदी के बीचोंबीच अस्थायी मार्ग बनाकर दोपहिया वाहनों की आवाजाही कराई जा रही है। इस मार्ग से गुजरने वाले वाहन चालकों से प्रति चक्कर के हिसाब से रुपये वसूलने के आरोप भी सामने आए हैं।
मामला केवल नदी के भीतर रास्ता बनाने तक सीमित नहीं है। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह सरकारी भूमि, नदी क्षेत्र में अनधिकृत निर्माण, खनिज सामग्री के उपयोग, संभावित पर्यावरणीय नुकसान और कथित शुल्क वसूली से जुड़ा गंभीर मामला हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यमुना नदी के भीतर रास्ता बनाने की अनुमति किसने दी और वहां से गुजरने वाले लोगों से रुपये वसूलने का अधिकार किसके पास है?
नदी के भीतर रास्ता बनाने का अधिकार किसने दिया?
यमुना नदी के भीतर अस्थायी मार्ग तैयार करने के लिए भारी मात्रा में पत्थर, बजरी और अन्य उपखनिज सामग्री की आवश्यकता होती है। ऐसे में भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि रास्ते के निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री कहां से लाई गई? क्या सामग्री नदी तल से निकाली गई या किसी वैध खनन पट्टे अथवा अधिकृत स्रोत से लाई गई? यदि नदी तल से उपखनिज निकाला गया है तो क्या नियमानुसार अनुमति ली गई थी? क्या संबंधित सामग्री की रॉयल्टी जमा कराई गई है?
यदि निर्माण में अवैध रूप से निकाली गई खनिज सामग्री का इस्तेमाल हुआ है तो यह जांच का विषय है। विभागीय अधिकारियों को मौके का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
प्रति चक्कर रुपये वसूली के आरोप, किसके खाते में जा रही रकम?
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू वाहन चालकों से कथित रूप से रुपये वसूलने का है। आरोप है कि अस्थायी रास्ते से गुजरने वाले दोपहिया वाहनों से प्रति चक्कर के हिसाब से पैसे लिए जा रहे हैं।
यदि यह रास्ता सरकारी नदी क्षेत्र में बनाया गया है तो यहां शुल्क वसूली का आधार क्या है? क्या जिला प्रशासन, संबंधित विभाग या किसी सक्षम प्राधिकारी ने इसकी अनुमति दी है? यदि शुल्क वसूली अधिकृत है तो उसका आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
वहीं यदि किसी निजी व्यक्ति या संस्था द्वारा बिना अनुमति के रुपये लिए जा रहे हैं तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वसूली की राशि किसके पास जा रही है और इसके पीछे कौन लोग जिम्मेदार हैं।
प्रशासन को इस पहलू की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
वन विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में
नदी क्षेत्र में बनाए गए अस्थायी रास्ते को लेकर वन विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संबंधित भूमि वन भूमि की श्रेणी में आती है या नहीं, इसकी पुष्टि राजस्व अभिलेखों और विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर की जानी चाहिए।
यदि क्षेत्र वन भूमि में आता है तो रास्ता बनाने के लिए आवश्यक स्वीकृति प्राप्त की गई थी या नहीं, यह जांच का विषय है। वन क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अनधिकृत गतिविधि होने की स्थिति में संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
ऐसे में वन विभाग को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि नौघाट पुल के समीप नदी क्षेत्र में इस प्रकार की गतिविधि की जानकारी विभाग को थी या नहीं।
सिंचाई विभाग की जिम्मेदारी: नदी के बहाव से खिलवाड़ तो नहीं?
यमुना नदी के भीतर अस्थायी रास्ता बनाए जाने से नदी के प्राकृतिक बहाव पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।
नदी के बीच में पत्थर और अन्य सामग्री डालकर रास्ता तैयार करने से जलधारा की दिशा प्रभावित होने, आसपास के तटों पर दबाव बढ़ने अथवा तेज बहाव की स्थिति में रास्ता क्षतिग्रस्त होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सिंचाई विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या इस मार्ग का तकनीकी निरीक्षण किया गया है? क्या नदी के जलस्तर, बहाव और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोई अनुमति अथवा तकनीकी आकलन किया गया है?
यदि बिना तकनीकी जांच के नदी के भीतर मार्ग बनाया गया है तो यह लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
राजस्व विभाग बताए, जमीन किसकी और रास्ता किसका?
इस मामले में राजस्व विभाग के सामने भी कई सवाल खड़े हैं। जिस क्षेत्र में अस्थायी रास्ता बनाया गया है, उसकी राजस्व अभिलेखों में क्या स्थिति है? क्या यह सरकारी भूमि है, नदी क्षेत्र है अथवा किसी अन्य श्रेणी की भूमि है?
रास्ता किस व्यक्ति या संस्था ने तैयार किया? क्या किसी विभाग ने इसे अस्थायी आवागमन के लिए अधिकृत किया है? क्या रास्ते के संचालन और शुल्क वसूली के लिए कोई लिखित आदेश जारी किया गया है?
इन सवालों का जवाब राजस्व रिकॉर्ड और संबंधित विभागों के दस्तावेजों से ही मिल सकता है।
जिलाधिकारी से संयुक्त जांच की मांग
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। जिलाधिकारी देहरादून डॉ. आशीष चौहान के निर्देशन में अवैध खनन और नदी क्षेत्रों में अनधिकृत गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। ऐसे में भीमावाला नौघाट पुल के समीप यमुना नदी के भीतर बनाए गए इस अस्थायी मार्ग की वैधता की जांच आवश्यक है।
प्रशासन को खनन, वन, सिंचाई और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम गठित कर मौके का निरीक्षण कराना चाहिए। जांच में निम्न बिंदुओं को शामिल किया जाना जरूरी है—
- अस्थायी रास्ते के निर्माण की अनुमति किस विभाग या प्राधिकारी ने दी?
- निर्माण में इस्तेमाल की गई उपखनिज सामग्री कहां से लाई गई?
- क्या निर्माण में नदी तल से निकाली गई सामग्री का इस्तेमाल हुआ?
- क्या संबंधित सामग्री की रॉयल्टी और अन्य देय शुल्क जमा किए गए?
- क्या दोपहिया वाहनों से रुपये वसूलने की अनुमति दी गई है?
- कथित वसूली की राशि किस व्यक्ति या संस्था के पास जा रही है?
- नदी के प्राकृतिक बहाव और आसपास के क्षेत्र की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं तो संबंधित व्यक्तियों और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
अचानक बढ़ा जलस्तर बन सकता है हादसे की वजह
यमुना नदी के भीतर वाहनों की आवाजाही केवल प्रशासनिक अनुमति या राजस्व का मामला नहीं है, बल्कि लोगों की जान से जुड़ा गंभीर विषय भी है।
नदी में अचानक जलस्तर बढ़ने, तेज बहाव आने अथवा रास्ते के क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में वाहन चालक बीच नदी में फंस सकते हैं। ऐसे में किसी बड़े हादसे की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब तक रास्ते की वैधता, तकनीकी सुरक्षा और संचालन की अनुमति स्पष्ट न हो, तब तक लोगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
आधिकारिक पुष्टि का इंतजार
फिलहाल अस्थायी रास्ते के निर्माण की अनुमति और वाहन चालकों से रुपये वसूलने के आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित विभागों का पक्ष और प्रशासनिक जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
दून वैली टाइम्स का सवाल: यदि यमुना नदी के भीतर रास्ता बनाने की अनुमति दी गई है तो अनुमति पत्र सार्वजनिक किया जाए। यदि वाहन चालकों से शुल्क वसूला जा रहा है तो उसका अधिकृत आदेश और वसूली का आधार सामने लाया जाए। और यदि यह सब बिना अनुमति हो रहा है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई कब होगी?
यमुना नदी के भीतर रास्ता बनाकर कथित वसूली का यह मामला अब संबंधित विभागों और जिला प्रशासन की जवाबदेही से जुड़ गया है। जनता को इंतजार है कि प्रशासन इस मामले में कब संज्ञान लेता है और जांच के बाद क्या कार्रवाई होती है।
