85 साल बाद भी अधूरा सपना: आखिर क्यों अटका 15 हजार करोड़ का किशाऊ बांध प्रोजेक्ट?

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देहरादून/नई दिल्ली। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। करीब 85 साल पुराने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को 2008 में राष्ट्रीय परियोजना (नेशनल प्रोजेक्ट) का दर्जा मिलने के बावजूद अब तक जमीन पर नहीं उतारा जा सका है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की बैठक में लंबे समय से चले आ रहे वित्तीय विवाद के समाधान के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है।

करीब 236 मीटर ऊंचा और 660 मेगावाट क्षमता वाला किशाऊ बांध एशिया के सबसे बड़े बांधों में शामिल होगा। परियोजना से प्रतिवर्ष लगभग 1379 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन होने का अनुमान है। साथ ही दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश समेत सात राज्यों को सिंचाई और पेयजल का लाभ मिलेगा।

1940 में शुरू हुई थी योजना

किशाऊ बांध का विचार पहली बार वर्ष 1940 में सामने आया था। इसके बाद कई बार सर्वेक्षण और डीपीआर तैयार हुईं, लेकिन तकनीकी खामियों, भूगर्भीय चुनौतियों और राज्यों के बीच सहमति न बनने के कारण परियोजना लगातार टलती रही। उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद उत्तराखंड राज्य बनने पर परियोजना की जिम्मेदारी दोनों राज्यों के साझा सहयोग से आगे बढ़ाई गई। वर्ष 2017 में किशाऊ बांध निगम लिमिटेड (KDDL) का गठन किया गया।

क्या होंगे फायदे?

परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। इसके अलावा 617 एमसीएम पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। बांध बनने के बाद 32 किलोमीटर लंबी झील का निर्माण होगा, जो क्षेत्र के विकास और पर्यटन को भी बढ़ावा दे सकती है।

हजारों लोग होंगे प्रभावित

परियोजना के निर्माण से उत्तराखंड के 9 और हिमाचल प्रदेश के 8 गांव जलमग्न होंगे। कुल 5,484 से अधिक लोग प्रभावित होंगे, जबकि लगभग 6 हजार लोगों को पुनर्वास की आवश्यकता पड़ेगी। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर परियोजना का विरोध भी लगातार जारी है।

लागत बढ़कर पहुंची 15 हजार करोड़

2018 में केंद्रीय जल आयोग ने परियोजना की अनुमानित लागत 11,500 करोड़ रुपये आंकी थी। महंगाई और अन्य खर्चों के कारण अब इसकी लागत बढ़कर लगभग 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।

क्यों अटका था प्रोजेक्ट?

पिछले आठ वर्षों से परियोजना का सबसे बड़ा विवाद वित्तीय हिस्सेदारी को लेकर था। हिमाचल प्रदेश सरकार परियोजना में भारी निवेश को लेकर सहमत नहीं थी। हाल ही में दिल्ली में हुई बैठक में समाधान निकलने के बाद हिमाचल प्रदेश को राहत मिली है। अब दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान हिमाचल के हिस्से की अनुमानित लागत वहन करेंगे। इसके बदले हिमाचल प्रदेश को हर साल करीब 600 करोड़ रुपये की आय और 100 करोड़ यूनिट बिजली मिलने का प्रावधान किया गया है।

कब तक पूरा होगा प्रोजेक्ट?

परियोजना के प्रारंभिक कार्यों के लिए 8.10 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। निर्माण शुरू होने के बाद इसे 96 महीनों (8 वर्ष) में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

किशाऊ बांध परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के विकास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, पुनर्वास, पर्यावरणीय प्रभाव और स्थानीय विरोध जैसी चुनौतियां अभी भी इसके सामने बड़ी बाधा बनी हुई हैं

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