आशुतोष नेगी के छह साल के निष्कासन के बाद यूकेडी में सियासी हलचल, 2027 से पहले संगठन की अग्निपरीक्षा
देहरादून। उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति में कभी अलग पहचान रखने वाले उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) में इन दिनों संगठनात्मक उठापटक ने सियासी चर्चाओं को तेज कर दिया है। पार्टी की केंद्रीय अनुशासन समिति ने पूर्व केंद्रीय उपाध्यक्ष आशुतोष नेगी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। 27 अगस्त 2026 को जारी आदेश में उनकी प्राथमिक सदस्यता पर भी तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की गई है।
पार्टी की ओर से नेगी पर सोशल मीडिया और अन्य सार्वजनिक माध्यमों में कथित तौर पर भ्रामक एवं तथ्यहीन बयानबाजी, वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों और दल-विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए गए हैं। पार्टी के अनुसार, उन्हें पहले भी नोटिस देकर स्पष्टीकरण मांगा गया था, लेकिन नेतृत्व के मुताबिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
पहले छीना गया था केंद्रीय उपाध्यक्ष का पद
आशुतोष नेगी के खिलाफ यह पहली बड़ी संगठनात्मक कार्रवाई नहीं है। इससे पहले यूकेडी ने उन्हें केंद्रीय उपाध्यक्ष और अन्य संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त किया था। इसके बाद अब छह वर्ष के निष्कासन का फैसला सामने आया है।
नेगी रायपुर विधानसभा क्षेत्र से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में सक्रिय बताए जा रहे थे। ऐसे में चुनावी तैयारियों के बीच उनका निष्कासन यूकेडी के लिए संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अंकिता भंडारी प्रकरण के बाद बने थे चर्चित चेहरा
आशुतोष नेगी अंकिता भंडारी प्रकरण को लेकर प्रदेशभर में चर्चा में आए थे। इसके बाद उन्होंने उत्तराखंड के विभिन्न जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर अपनी सक्रियता बढ़ाई। वर्ष 2024 में उन्होंने यूकेडी की सदस्यता ग्रहण की और पार्टी के टिकट पर गढ़वाल लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ा। बाद में उन्हें पार्टी में केंद्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई।
नेगी की सक्रियता से यूकेडी के साथ युवाओं के जुड़ने की चर्चा भी हुई। यही वजह है कि मौजूदा कार्रवाई को केवल एक नेता के निष्कासन के तौर पर नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूकेडी के संगठनात्मक भविष्य से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
यूकेडी के सामने सबसे बड़ा सवाल—क्या फिर लौटेगा पुराना जनाधार?
उत्तराखंड क्रांति दल का इतिहास राज्य आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा है। वर्ष 1979 में स्थापित यूकेडी ने पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राज्य गठन के बाद शुरुआती चुनावों में पार्टी ने विधानसभा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और एक समय वह प्रदेश की राजनीति में तीसरी ताकत के तौर पर देखी जाती थी।
लेकिन समय के साथ पार्टी का चुनावी प्रभाव लगातार कमजोर हुआ। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक 2002 में यूकेडी ने चार विधानसभा सीटें जीतीं, 2007 में तीन सीटों पर सफलता मिली और 2012 में पार्टी एक सीट तक सिमट गई। इसके बाद विधानसभा में पार्टी की मौजूदगी खत्म हो गई।
अब सवाल यही है कि क्या 2027 का विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए राजनीतिक पुनरुत्थान का अवसर बनेगा?

आंतरिक मतभेद या नई शुरुआत?
यूकेडी के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे अपने पारंपरिक मुद्दों—जल, जंगल, जमीन, स्थानीय अधिकार, रोजगार, पलायन और पहाड़ के विकास—को फिर से जनता के बीच प्रभावी ढंग से ले जाना होगा, वहीं दूसरी तरफ संगठन के भीतर मतभेदों और नेतृत्व संबंधी विवादों को भी नियंत्रित करना होगा।
आशुतोष नेगी का निष्कासन ऐसे समय हुआ है जब प्रदेश की राजनीतिक पार्टियां 2027 विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार करने में जुटी हैं। ऐसे में यह घटनाक्रम यूकेडी के लिए नुकसान का कारण बनेगा या संगठन को और अनुशासित एवं मजबूत करने की दिशा में कदम साबित होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
क्या इतिहास दोहराएगा यूकेडी?
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता और पहाड़ के सवाल आज भी महत्वपूर्ण हैं। यही वे मुद्दे हैं जिनके सहारे यूकेडी ने कभी प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई थी।
लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य क्षेत्रीय एवं नए राजनीतिक विकल्प भी मैदान में हैं। ऐसे में यूकेडी को सिर्फ पुराने इतिहास के भरोसे नहीं, बल्कि नए नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट राजनीतिक एजेंडे के साथ जनता के बीच जाना होगा।
2027 का चुनाव तय करेगा कि उत्तराखंड क्रांति दल सिर्फ राज्य आंदोलन की विरासत बनकर रह गया है या फिर पहाड़ की राजनीति में एक बार फिर अपनी खोई हुई जमीन हासिल कर सकता है।
