जौनसार-बावर की अनूठी देव परंपरा: जब ‘देव माली’ के माध्यम से श्रद्धालु साझा करते हैं अपने दुख-दर्द

चौकी लगाकर देव-अवस्था में आने की मान्यता, देवधुनों के बीच होती है देववाणी; महासू देवता की आराधना से जुड़ी सदियों पुरानी लोक परंपरा आज भी कायम

विशेष सांस्कृतिक रिपोर्ट | दीवान सिंह तोमर | दून वैली टाइम्स

उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता से ही नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं से भी है। इसी सांस्कृतिक विरासत में ‘देव माली’ की परंपरा का विशेष स्थान है। स्थानीय मान्यता के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों और देवधुनों के बीच कुछ विशेष व्यक्तियों में आराध्य देवता का अवतरण अथवा देव-अवस्था होती है। ऐसे व्यक्ति को स्थानीय बोली में ‘माली’ कहा जाता है।

जौनसार-बावर के विभिन्न मंदिरों में विशेष पूजा, जागड़ा और अन्य धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। इस दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन, देवगीत और जयकारों के बीच चौकी लगाकर देव माली के माध्यम से देववाणी सुनने की परंपरा निभाई जाती है।

देव माली से साझा करते हैं अपनी पीड़ा

स्थानीय आस्था के अनुसार जब देव-अवस्था में माली के सामने श्रद्धालु पहुंचते हैं तो वे अपने परिवार से जुड़ी परेशानियां, मनोकामनाएं, विवाद और जीवन से संबंधित अन्य समस्याएं उनके सामने रखते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि देव माली उनकी बात सुनकर देववाणी के माध्यम से मार्गदर्शन करते हैं।

कई स्थानों पर लोग अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं और देवता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यह प्रक्रिया स्थानीय समाज के लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, सामाजिक संवाद और सामुदायिक एकजुटता का हिस्सा भी मानी जाती है।

महासू देवता की आराधना से गहरा संबंध

जौनसार-बावर में चार महासू देवताओं की आराधना का विशेष महत्व है। महासू देवता से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों पर जागड़ा सहित विभिन्न अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप और देवगीतों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

हनोल सहित महासू देवता से जुड़े विभिन्न धार्मिक स्थलों पर होने वाले आयोजनों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार देव माली की भूमिका भी देखने को मिलती है। हालांकि अलग-अलग गांवों और मंदिरों में इस परंपरा की विधि और मान्यताओं में स्थानीय अंतर हो सकता है।

देववाणी और लोकविश्वास

देव माली के माध्यम से मिलने वाले संदेशों को स्थानीय श्रद्धालु देववाणी के रूप में श्रद्धा से स्वीकार करते हैं। परंपरागत समाज में ऐसे अवसरों पर व्यक्तिगत और सामाजिक विवादों से लेकर पारिवारिक समस्याओं तक के बारे में मार्गदर्शन लेने की मान्यता रही है।

इसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित अलौकिक घटना के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय स्थानीय धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझना महत्वपूर्ण है। यही विश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा को जीवित रखे हुए है।

अंगारों और सांकलों से जुड़ी मान्यताएं भी चर्चा में

कुछ धार्मिक आयोजनों में देव-अवस्था से जुड़े ऐसे अनुष्ठानों का भी उल्लेख मिलता है जिनमें माली द्वारा कठिन धार्मिक क्रियाएं किए जाने की स्थानीय मान्यता है। इनमें अंगारों के बीच चलना अथवा शरीर पर सांकल आदि से संबंधित प्रदर्शन शामिल बताए जाते हैं। इनके संबंध में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं और व्याख्याएं मिलती हैं। ऐसे अनुष्ठानों को बिना प्रमाण के चमत्कार या शारीरिक क्षति न होने की निश्चित वैज्ञानिक घटना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक

जौनसार-बावर में देव परंपराएं धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। जागड़ा, देवपूजा और अन्य आयोजनों में गांव-गांव से लोग एकत्र होते हैं। इससे नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों, लोकवाद्य और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिलता है।

देव माली की परंपरा केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जौनसार-बावर की जीवंत लोक संस्कृति और सामुदायिक आस्था की तस्वीर भी प्रस्तुत करती है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी देव-परंपराओं और देव-अवस्था से जुड़े स्थानीय रूप देखने को मिलते हैं, हालांकि उनकी विधियां और मान्यताएं अलग हो सकती हैं।

पीढ़ियों से चली आ रही आस्था आज भी कायम

आधुनिकता और बदलते सामाजिक परिवेश के बावजूद जौनसार-बावर में अपनी लोक संस्कृति के प्रति लोगों का जुड़ाव दिखाई देता है। मंदिरों में पहुंचने वाले श्रद्धालु आज भी देवता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं और अपनी समस्याओं व मनोकामनाओं को देवता के सामने रखते हैं।

देव माली की परंपरा इसी लोकविश्वास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है—जहां आस्था, परंपरा, लोकसंगीत और सामुदायिक भावना एक साथ दिखाई देती है।

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