छह राज्यों के बीच हुआ ऐतिहासिक समझौता, 422 मेगावाट बिजली उत्पादन और जल सुरक्षा को मिलेगी मजबूती
नई दिल्ली/देहरादून। वर्षों से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को आगे बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित बैठक के दौरान उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच किशाऊ परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर समझौता हुआ। छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में समझौते पर हस्ताक्षर किए।

यह परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित है। टौंस यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। परियोजना को लंबे समय से अंतरराज्यीय जल बंटवारे और लागत संबंधी मुद्दों के कारण आगे बढ़ाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। अब राज्यों के बीच सहमति बनने से परियोजना के क्रियान्वयन का रास्ता साफ हुआ है।
1562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडारण क्षमता
आधिकारिक जानकारी के अनुसार किशाऊ परियोजना के तहत टौंस नदी पर करीब 232.6 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध का निर्माण प्रस्तावित है। परियोजना की जल भंडारण क्षमता लगभग 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी। इसके साथ करीब 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई तथा स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है।
परियोजना की विद्युत उत्पादन क्षमता 422 मेगावाट बताई गई है। इससे जल संसाधन प्रबंधन, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और ऊर्जा के क्षेत्र में संबंधित राज्यों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

यमुना पुनर्जीवन से भी जुड़ी परियोजना
किशाऊ परियोजना को केवल बांध और बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं माना जा रहा है। केंद्र सरकार के अनुसार परियोजना से यमुना में स्वच्छ जल के प्रवाह को बढ़ाने और यमुना के पुनर्जीवन की दिशा में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
परियोजना में जल बंटवारे को लेकर छह राज्यों के बीच सहमति बनाई गई है। केंद्र सरकार के अनुसार परियोजना के जल घटक की लगभग 90 प्रतिशत लागत केंद्रीय सहायता के रूप में वहन की जाएगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत लागत सहभागी राज्यों द्वारा साझा की जाएगी।
उत्तराखंड के सामने पुनर्वास और वन भूमि की चुनौती
परियोजना के निर्माण से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है। ऐसे में प्रभावित परिवारों का उचित पुनर्वास महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा।
उत्तराखंड सरकार ने परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को प्राथमिकता देने की बात कही है। साथ ही परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में वन भूमि के हस्तांतरण और उसके बदले क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भूमि उपलब्ध कराना भी राज्य के सामने महत्वपूर्ण चुनौती होगी। उत्तराखंड सरकार ने इस मामले में केंद्र और सहभागी राज्यों से सहयोग का आग्रह किया है।

आठ दशक पुरानी परियोजना को मिली नई दिशा
किशाऊ परियोजना की परिकल्पना वर्ष 1940 में की गई थी। लंबे समय तक विभिन्न कारणों से यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। जून 2026 में केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच हुई बैठक के बाद जल बंटवारे और लागत से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनाने की दिशा में काम तेज हुआ था।
अब सितंबर 2026 में हुए समझौते के बाद परियोजना को अगली प्रक्रिया के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। केंद्र सरकार के अनुसार समझौते के बाद किशाऊ परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए रखा जाएगा।

छह राज्यों के लिए महत्वपूर्ण परियोजना
किशाऊ परियोजना का असर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली पर भी पड़ेगा। परियोजना से सिंचाई, पेयजल, ऊर्जा और जल सुरक्षा से जुड़े लाभ मिलने की उम्मीद है।
दशकों से लंबित इस परियोजना पर राज्यों के बीच बनी सहमति को अंतरराज्यीय सहयोग और जल संसाधनों के साझा प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
