45 दिन में कब्जा देने, सेल डीड कराने और 13 साल की देरी का ब्याज चुकाने का आदेश
काशीपुर। उत्तराखंड रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) ने 16 साल पुराने प्लॉट विवाद में खरीदार के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। प्राधिकरण ने समिया इंटरनेशनल बिल्डर्स प्रा. लि. को 45 दिनों के भीतर दो प्लॉटों का कब्जा देने, बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित करने तथा करीब 13 वर्षों की देरी का ब्याज अदा करने के आदेश दिए हैं। यह आदेश रेरा के प्रभारी अध्यक्ष नरेश सी. मठपाल ने जारी किया।
दिल्ली निवासी इंदु बाला सतीजा ने अपने मुख्तारनामा धारक धर्मवीर सतीजा के माध्यम से रेरा में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार वर्ष 2010 में उन्होंने उधमसिंह नगर के काशीपुर रोड स्थित ‘समिया लेक सिटी’ परियोजना के गुलमोहर-3 सेक्टर में दो प्लॉट बुक कराए थे। शुरुआत में उन्हें प्लॉट संख्या C-1 और B-19 आवंटित किए गए, लेकिन बाद में C-1 के स्थान पर B-18 आवंटित कर दिया गया।
दोनों प्लॉटों की मूल कीमत 2.89 लाख रुपये प्रति प्लॉट थी। अन्य शुल्कों सहित शिकायतकर्ता ने वर्ष 2013 तक कुल 6,45,500 रुपये का भुगतान कर दिया। बिल्डर ने भुगतान पूरा होने पर ‘नो ड्यूज’ प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया, लेकिन इसके बावजूद वर्षों तक प्लॉट का कब्जा नहीं सौंपा गया।
बिल्डर नहीं हुआ पेश, एकपक्षीय सुनवाई
रेरा की सुनवाई के दौरान बिल्डर कंपनी को कई अवसर दिए गए, लेकिन उसने न तो अपना जवाब दाखिल किया और न ही कोई अधिकृत प्रतिनिधि उपस्थित हुआ। इसके बाद प्राधिकरण ने मामले की एकपक्षीय सुनवाई करते हुए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया।
प्राधिकरण ने माना कि शिकायतकर्ता द्वारा पूरा भुगतान किए जाने और बिल्डर द्वारा स्वयं ‘नो ड्यूज’ प्रमाण पत्र जारी करने के बावजूद कब्जा न देना रेरा अधिनियम, 2016 की धारा-18 का स्पष्ट उल्लंघन है।
रेरा के आदेश
रेरा ने बिल्डर कंपनी को निर्देश दिए हैं कि—
● 45 दिनों के भीतर प्लॉट संख्या B-18 (पूर्व C-1) और B-19 का सभी मूलभूत एवं सामुदायिक सुविधाओं सहित कब्जा सौंपा जाए।
● कब्जा सौंपने के एक माह के भीतर दोनों प्लॉटों की सेल डीड शिकायतकर्ता के पक्ष में निष्पादित की जाए।
● 16 जनवरी 2013 से आदेश की तिथि तक 6,45,500 रुपये पर 10.80 प्रतिशत वार्षिक ब्याज (एसबीआई की उच्चतम एमसीएलआर + 2%) का भुगतान किया जाए।
● यदि 45 दिनों में कब्जा नहीं दिया जाता है तो वास्तविक कब्जा मिलने तक इसी दर से अतिरिक्त विलंब ब्याज भी अदा करना होगा।
रेरा के इस फैसले को लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे प्लॉट खरीदारों के लिए राहत भरा और महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
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