खनन माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने वाले अधिकारी के निलंबन पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक, सरकार को कानून के अनुसार नया आदेश जारी करने की छूट

देहरादून: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन विभाग के चर्चित अधिकारी और तत्कालीन कालसी वन प्रभाग के उप प्रभागीय वनाधिकारी (एसडीओ) राजीव नयन नौटियाल के निलंबन आदेश को निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 10 जुलाई 2026 को यह फैसला सुनाया।
राजीव नयन नौटियाल वर्तमान में सहायक वन संरक्षक (Assistant Conservator of Forest) के पद पर कार्यरत हैं। निलंबन के समय उनकी तैनाती कालसी में एसडीओ के रूप में थी। राज्य सरकार ने 25 जून 2026 को उन्हें निलंबित किया था। उनकी ओर से अधिवक्ता शशांक पांडे और अक्षय प्रधान ने हाईकोर्ट में पैरवी की।
इन दो आरोपों के आधार पर हुआ था निलंबन
राज्य सरकार ने नौटियाल के खिलाफ दो प्रमुख आरोप लगाए थे। पहला आरोप यह था कि उन्होंने सेवा के नियमितीकरण के दौरान प्रस्तुत प्रमाण पत्र में अपने खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई। यह मामला अपराध संख्या 350/2024 से संबंधित है, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 498, 504, 506 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत मुकदमा दर्ज है।
दूसरा आरोप यह था कि वह राज्य के वन मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित विभागीय अधिकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक में अनुपस्थित रहे थे। इन्हीं आरोपों के आधार पर विभाग ने उनके निलंबन की कार्रवाई की थी।
याचिकाकर्ता ने निलंबन को बताया अवैध
राजीव नयन नौटियाल की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप ऐसे नहीं हैं, जिनके सिद्ध होने पर कोई बड़ी विभागीय सजा दी जा सके। यह भी कहा गया कि निलंबन आदेश में आवश्यक कानूनी शर्तों का पालन नहीं किया गया तथा आदेश दुर्भावनापूर्ण और तथ्यहीन है।
सरकार भी पूरी नहीं कर सकी कानूनी आवश्यकता
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने विभाग से प्राप्त निर्देशों के आधार पर आरोपों का समर्थन करने का प्रयास किया। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि निलंबन आदेश में यह उल्लेख नहीं किया गया था कि आरोप इतने गंभीर हैं कि सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारी को बड़ी सजा दी जा सकती है।
खंडपीठ ने कहा कि उत्तराखंड सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 2003 के नियम 4(1) के तहत किसी भी सरकारी कर्मचारी को निलंबित करते समय आदेश में स्पष्ट रूप से यह दर्ज होना आवश्यक है कि आरोप इतने गंभीर हैं कि उनके सिद्ध होने पर बड़ी सजा दी जा सकती है। अदालत के अनुसार निलंबन आदेश में इस अनिवार्य शर्त का उल्लेख नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने रद्द किया निलंबन, विभाग को दी नई कार्रवाई की छूट
इसी कानूनी आधार पर हाईकोर्ट ने 25 जून 2026 का निलंबन आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने मामले के अन्य पहलुओं पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह स्पष्ट किया कि यदि विभाग उचित समझे तो कानून के अनुरूप नया निलंबन आदेश जारी कर सकता है। साथ ही, यदि भविष्य में ऐसा आदेश जारी होता है तो राजीव नयन नौटियाल उसे उपलब्ध सभी कानूनी आधारों पर चुनौती देने के लिए स्वतंत्र होंगे।
फैसले का महत्व
यह निर्णय सरकारी विभागों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि निलंबन जैसे कठोर प्रशासनिक कदम उठाते समय नियमों और प्रक्रिया का पूर्ण पालन आवश्यक है। केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आदेश में आरोपों की गंभीरता और संभावित दंड का स्पष्ट उल्लेख होना भी अनिवार्य है, अन्यथा ऐसी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगी।
खनन माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई से बने चर्चित
राजीव नयन नौटियाल पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के सबसे चर्चित वन अधिकारियों में शामिल रहे हैं। उन्होंने कालसी, विकासनगर, चकराता और आसन कंजर्वेशन रिजर्व क्षेत्र में अवैध खनन के खिलाफ लगातार अभियान चलाया। कई बार वह स्वयं मौके पर पहुंचकर डंपरों को पकड़ते और कार्रवाई करते रहे। समर्थक उन्हें एक सख्त और ईमानदार अधिकारी मानते हैं, जबकि विभागीय स्तर पर उनकी कार्यशैली को लेकर विवाद भी रहे हैं।
इसलिए चर्चा में आए
- यमुना नदी और आसपास के क्षेत्रों में अवैध खनन के खिलाफ लगातार अभियान।
- संरक्षित वन क्षेत्रों में डंपरों और मशीनों की गतिविधियों पर सख्त निगरानी।
- आसन कंजर्वेशन रिजर्व क्षेत्र में पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन कराया।
- स्थानीय दबाव के बावजूद अवैध खनन के मामलों में कार्रवाई जारी रखी।
बार-बार तबादले और सुरक्षा की मांग
दिसंबर 2025 में उनका तबादला भी विवादों में रहा, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने स्थानांतरण प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों के पालन पर सवाल उठाते हुए उन्हें राहत दी थी।
वहीं, उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा था कि अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई के कारण उन्हें जान का खतरा है और सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग भी की थी।
मारपीट के मामले में भी मिला था हाईकोर्ट का साथ
फरवरी 2026 में विकासनगर के बाड़वाला-यमुना पुल क्षेत्र में अवैध खनन की सूचना मिलने पर वह मौके पर पहुंचे थे। आरोप है कि जब उन्होंने एक डंपर का वीडियो और फोटो बनाना शुरू किया तो कुछ लोगों ने उनके साथ अभद्रता और मारपीट की। इसके बाद दोनों पक्षों की ओर से मुकदमे दर्ज हुए।
यह मामला इतना गंभीर हुआ कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए विकासनगर थाने के पूरे स्टाफ के स्थानांतरण और संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
समर्थन और विभाग का पक्ष
निलंबन के बाद भी कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों का कहना है कि यह कार्रवाई अवैध खनन के खिलाफ उनकी सख्त मुहिम का परिणाम है और उन्हें “व्हिसलब्लोअर अधिकारी” के रूप में निशाना बनाया गया। वहीं वन विभाग का आधिकारिक पक्ष है कि निलंबन पूरी तरह विभागीय अनुशासन और प्रशासनिक कारणों के आधार पर किया गया था।
इस पूरे मामले ने उत्तराखंड में अवैध खनन बनाम प्रशासनिक अनुशासन की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है। एक पक्ष उन्हें खनन माफिया के खिलाफ लड़ने वाला अधिकारी मानता है, जबकि दूसरा पक्ष विभागीय जवाबदेही और सेवा नियमों के पालन को प्रमुख मुद्दा बता रहा है।



