जौनसार-बावर सहित पश्मी में गूंजे महासू महाराज के जयकारे

शाही स्नान के लिए निकले छत्रधारी चालदा महासू, ढोल-दमाऊं और रणसिंघों से भक्तिमय हुआ माहौल

विशेष रिपोर्ट | दीवान सिंह तोमर | दून वैली टाइम्स

देहरादून/जौनसार-बावर। जौनसार-बावर की सदियों पुरानी देव परंपरा, लोकसंस्कृति और धार्मिक आस्था का प्रतीक महासू देवता का जागड़ा पर्व श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर देवस्थलों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। ढोल-दमाऊं, रणसिंघों और महासू महाराज के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय नजर आया।

जागड़ा पर्व के अवसर पर श्री छत्रधारी चालदा महासू महाराज ने शाही स्नान के लिए प्रस्थान किया। देव डोली के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और जयकारों के बीच शामिल हुए। इस दौरान जौनसार-बावर की विशिष्ट देव संस्कृति और लोक परंपरा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।

शाही स्नान के लिए प्रस्थान के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। जगह-जगह लोगों ने महासू महाराज के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और परिवार, समाज तथा क्षेत्र की सुख-शांति, समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की।

चार महासू भाइयों की परंपरा में गहरी आस्था

जौनसार-बावर की देव संस्कृति में चार महासू भाइयों की विशेष मान्यता है। लोकपरंपरा में बासिक महासू, बोठा महासू, पवासी महासू और चालदा महासू को चार देव भाइयों के रूप में पूजा जाता है।

बासिक महासू को ज्येष्ठ भाई माना जाता है और उनकी देव परंपरा मेंद्रथ क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है। वहीं बोठा महासू का प्रसिद्ध मंदिर हनोल में स्थित है, जो जौनसार-बावर की धार्मिक पहचान का प्रमुख केंद्र है।

पवासी महासू की देव परंपरा बंगाण क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है, जबकि चालदा महासू को भ्रमणशील देवता के रूप में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार चालदा महासू समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर प्रवास करते हैं। उनके प्रवास के दौरान संबंधित क्षेत्रों में विशेष धार्मिक आयोजन और देव परंपराओं का निर्वहन किया जाता है।

देवस्थलों में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

जागड़ा पर्व को लेकर क्षेत्र के विभिन्न महासू देवस्थलों में विशेष तैयारियां की गईं। थैना, भंजरा, लखवाड़, कचटा, हनोल और अन्य देवस्थलों में श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। मंदिरों को पारंपरिक ढंग से सजाया गया और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच देव संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए।

जौनसार-बावर के गांवों में जागड़ा पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामुदायिक सहभागिता का भी पर्व है। महिलाएं और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। ढोल-दमाऊं की थाप और लोकधुनों के बीच ग्रामीणों ने अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को जीवंत किया।

न्याय के देवता के रूप में महासू महाराज की विशेष प्रतिष्ठा

जौनसार-बावर में महासू देवता को न्याय के देवता के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। लोकविश्वास के अनुसार लोग अपनी समस्याओं, दुख-दर्द और विवादों को लेकर महासू महाराज के दरबार में न्याय की गुहार लगाते हैं।

महासू देवता की आस्था यहां केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक और सामुदायिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है। पीढ़ियों से चली आ रही देव परंपराओं को बुजुर्ग नई पीढ़ी तक पहुंचाते रहे हैं।

जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और गणमान्य लोगों की मौजूदगी

जागड़ा पर्व एवं शाही स्नान के इस धार्मिक अवसर पर प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, चकराता क्षेत्र के विधायक प्रीतम सिंह, उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद वर्धन, विकासनगर विधायक मुन्ना सिंह चौहान, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रामशरण नौटियाल, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान, पूर्व राज्यमंत्री मूरत राम शर्मा एवं प्रताप सिंह रावत सहित कई जनप्रतिनिधि, अधिकारी, नेता और क्षेत्र के गणमान्य लोग मौजूद रहे।

विशिष्ट अतिथियों और स्थानीय लोगों की मौजूदगी ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया। जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों ने महासू महाराज के दर्शन कर क्षेत्र की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की तथा जौनसार-बावर की समृद्ध देव एवं लोक संस्कृति को प्रदेश की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत बताया।

आस्था के साथ संस्कृति और सामाजिक एकजुटता का संदेश

महासू जागड़ा पर्व जौनसार-बावर की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पर्व में धर्म के साथ-साथ लोकसंस्कृति, सामाजिक एकता और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

ढोल-दमाऊं की थाप, रणसिंघों की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा और देव अनुष्ठानों के बीच हजारों लोगों की आस्था इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के दौर में भी जौनसार-बावर की सदियों पुरानी देव परंपराएं मजबूती से जीवित हैं।

पहाड़ की मिट्टी से उठती आस्था की आवाज

महासू जागड़ा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जौनसार-बावर की सांस्कृतिक आत्मा और पहचान का प्रतीक है। शाही स्नान के लिए निकले छत्रधारी चालदा महासू महाराज की देव डोली के साथ उमड़ा जनसैलाब क्षेत्र की गहरी धार्मिक आस्था और परंपरा का जीवंत प्रमाण बना।

ढोल-दमाऊं और रणसिंघों की गूंज के बीच चारों महासू भाइयों के जयकारों से जौनसार-बावर का वातावरण गुंजायमान रहा—

“जय श्री बासिक महासू महाराज की!”
“जय श्री बोठा महासू महाराज की!”
“जय श्री पवासी महासू महाराज की!”
“जय श्री छत्रधारी चालदा महासू महाराज की!”


दून वैली टाइम्स
विशेष रिपोर्ट : दीवान सिंह तोमर
जौनसारबावर की आस्था, संस्कृति और परंपरा की आवाज

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