जागड़ा पर्व पर उमड़ा आस्था का सैलाब, शाही स्नान के लिए निकले छत्रधारी चालदा महासू
विशेष रिपोर्ट | दीवान सिंह तोमर | दून वैली टाइम्स
देहरादून/जौनसार-बावर।
जौनसार-बावर की सदियों पुरानी देव परंपरा, लोकसंस्कृति और धार्मिक आस्था का प्रतीक महासू देवता का जागड़ा पर्व सोमवार को पूरे क्षेत्र में श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। सिद्धपीठ महासू देवता हनोल, चालदा महाराज थान सहित जौनसार-बावर के विभिन्न देवस्थलों पर दिनभर आस्था का सैलाब उमड़ा। ढोल-दमाऊं, रणसिंघों और महासू महाराज के जयकारों से पूरा जौनसार-बावर भक्तिमय नजर आया।
जागड़ा पर्व के अवसर पर श्री छत्रधारी चालदा महासू महाराज की देव डोली ने शाही स्नान के लिए प्रस्थान किया। देव पालकी के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और जयकारों के बीच शामिल हुए। देव डोली के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े। जैसे ही देव पालकियां मंदिरों के गर्भगृह से बाहर निकलीं, पूरा वातावरण ‘महासू देवता की जय’ और ‘चालदा महाराज की जय’ के जयकारों से गूंज उठा।
हनोल से थैना और कचटा तक उमड़ी भीड़
जागड़ा पर्व को लेकर हनोल, थैना, लखवाड़, लखस्यार, बिसोई, कचटा, टगरी, खाटुवा, पंचरा और टुंगरा समेत क्षेत्र के विभिन्न महासू-चालदा देवता के थानों में विशेष धार्मिक आयोजन हुए। सुबह से ही मंदिरों में देवता को भेंट चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं।
श्रद्धालुओं ने देव डोलियों पर चावल, अखरोट, रुपये और फूलों की वर्षा कर अपनी श्रद्धा अर्पित की। लोगों ने महासू महाराज से अपने परिवार, समाज, क्षेत्र और देश की सुख-समृद्धि, शांति एवं खुशहाली की कामना की।
देव पालकियों के दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद उन्हें संबंधित पवित्र जलस्रोतों पर स्नान कराया गया। इस दौरान देवस्थलों पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक संस्कृति की भी झलक देखने को मिली।
बिसोई और कचटा की देव पालकियां पहुंचीं यमुना तट
खत बहलाड़ के बिसोई और खत कोरू के कचटा मंदिर से देव पालकियों को शाही स्नान के लिए यमुना नदी तक ले जाया गया। देव पालकियों के साथ हजारों श्रद्धालुओं ने नंगे पांव पदयात्रा की।
यात्रा के दौरान रास्ते भर श्रद्धालुओं ने फूल-मालाओं और देव धूप के साथ पालकियों का स्वागत किया। ढोल-दमाऊं और रणसिंघों की गूंज के बीच देव डोली के साथ चल रहे श्रद्धालुओं में गजब का उत्साह दिखाई दिया।
यमुना तट पर विधि-विधान के साथ शाही स्नान कराया गया। स्नान के बाद देव पालकियों के वापस मंदिर पहुंचने पर श्रद्धालुओं ने दर्शन कर आशीर्वाद लिया। इसके बाद प्रसाद वितरण और भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
चार महासू भाइयों की परंपरा में गहरी आस्था
जौनसार-बावर की देव संस्कृति में चार महासू भाइयों—बासिक महासू, बोठा महासू, पवासी महासू और चालदा महासू की विशेष मान्यता है। लोकपरंपरा में चारों को देव भाइयों के रूप में पूजा जाता है और प्रत्येक की अपनी देवस्थली तथा क्षेत्रीय मान्यताएं हैं।
बासिक महासू को ज्येष्ठ भाई माना जाता है और उनकी देव परंपरा मेंद्रथ क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है। बोठा महासू का प्रसिद्ध मंदिर हनोल में स्थित है, जो जौनसार-बावर की धार्मिक पहचान का प्रमुख केंद्र है।
पवासी महासू की देव परंपरा बंगाण क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है, जबकि चालदा महासू को भ्रमणशील देवता के रूप में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार चालदा महासू समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर प्रवास करते हैं और उनके प्रवास के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं।
न्याय के देवता के रूप में महासू महाराज की प्रतिष्ठा
जौनसार-बावर में महासू देवता को न्याय के देवता के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। लोकविश्वास के अनुसार लोग अपनी समस्याओं, दुख-दर्द और विवादों को लेकर महासू महाराज के दरबार में न्याय की गुहार लगाते हैं।
महासू देवता की आस्था केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक और सामुदायिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है। पीढ़ियों से चली आ रही देव परंपराओं को बुजुर्ग नई पीढ़ी तक पहुंचाते रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और गणमान्य लोगों की मौजूदगी
जागड़ा पर्व एवं शाही स्नान के इस धार्मिक अवसर पर प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, चकराता क्षेत्र के विधायक प्रीतम सिंह, उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद वर्धन, विकासनगर विधायक मुन्ना सिंह चौहान, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रामशरण नौटियाल, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान, पूर्व राज्यमंत्री मूरत राम शर्मा एवं प्रताप सिंह रावत सहित कई जनप्रतिनिधि, अधिकारी, नेता और क्षेत्र के गणमान्य लोग मौजूद रहे।
विशिष्ट अतिथियों और स्थानीय लोगों की मौजूदगी ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया। जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों ने महासू महाराज के दर्शन कर क्षेत्र की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की तथा जौनसार-बावर की समृद्ध देव एवं लोक संस्कृति को प्रदेश की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत बताया।
आस्था के साथ संस्कृति और सामाजिक एकजुटता का संदेश
महासू जागड़ा पर्व जौनसार-बावर की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकसंस्कृति, सामाजिक एकता और सामुदायिक सहभागिता का भी उत्सव है।
पारंपरिक वेशभूषा में महिला-पुरुषों की भागीदारी, ढोल-दमाऊं की थाप, रणसिंघों की गूंज, लोकधुनों और देव अनुष्ठानों ने जौनसार-बावर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया।
आधुनिकता के दौर में भी जागड़ा पर्व यह संदेश देता है कि पहाड़ की देव परंपराएं और लोकसंस्कृति आज भी लोगों के जीवन में उतनी ही गहराई से रची-बसी हैं।
पहाड़ की मिट्टी से उठती आस्था की आवाज
महासू जागड़ा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जौनसार-बावर की सांस्कृतिक आत्मा और पहचान का प्रतीक है। शाही स्नान के लिए निकली छत्रधारी चालदा महासू महाराज की देव डोली के साथ उमड़ा जनसैलाब क्षेत्र की गहरी धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत प्रमाण बना।
ढोल-दमाऊं और रणसिंघों की गूंज के बीच पूरा क्षेत्र चारों महासू भाइयों के जयकारों से गुंजायमान रहा—
“जय श्री बासिक महासू महाराज की!”
“जय श्री बोठा महासू महाराज की!”
“जय श्री पवासी महासू महाराज की!”
“जय श्री छत्रधारी चालदा महासू महाराज की!”
