साहिया/ चकराता। जौनसार-बावर क्षेत्र में सोमवार को पारंपरिक कोदो की नैटावण पर्व धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। मंडवा यानी रागी की निराई-गुड़ाई का काम पूरा करने के बाद किसान इस पर्व को मनाने की परंपरा निभाते हैं। यह पर्व जौनसार-बावर की अनूठी लोकसंस्कृति, सामूहिकता और पारंपरिक कृषि व्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है।
जौनसार-बावर अपनी विशिष्ट संस्कृति, मेहनतकश ग्रामीण जीवन और पारंपरिक जैविक खेती के लिए जाना जाता है। यहां खेती-किसानी केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि लोकजीवन और परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्षेत्र के किसान अन्य फसलों के साथ पारंपरिक रूप से मंडवा (कोदो) की खेती भी करते हैं। मंडवा की फसल में निराई-गुड़ाई का काम पूरा होने के बाद ग्रामीण नैटावण पर्व मनाते हैं।
सामूहिक श्रम की मिसाल है पर्व
मंडवा की निराई-गुड़ाई के दौरान खेतों में किसान और विशेषकर महिलाएं सामूहिक रूप से काम करती हैं। सिर पर टोकरियां और हाथों में कृषि उपकरण लेकर महिलाएं खेतों में निराई-गुड़ाई करती नजर आती हैं। इस दौरान लोकगीत गाते हुए काम करने की परंपरा ग्रामीण जीवन में आज भी दिखाई देती है।
जौनसार-बावर में खेती का मुख्य आधार बारिश है। क्षेत्र में खेती का बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर रहता है। फसलों के उत्पादन के लिए लंबे समय से गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जाता रहा है, जिससे पारंपरिक खेती और जैविक कृषि पद्धति को बढ़ावा मिलता है।
पलायन का खेती पर पड़ा असर
हालांकि शिक्षा और रोजगार के कारण बड़ी संख्या में लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। कई ग्रामीण रोजगार के लिए दूसरे क्षेत्रों में चले गए हैं, जिसके कारण गांवों में खेती करने वाले लोगों की संख्या भी कम हुई है। कुछ परिवारों ने खेती का रकबा घटा दिया है और कई खेत अब पहले की तरह आबाद नहीं रह गए हैं।
इसके बावजूद जौनसार-बावर में सामूहिकता की परंपरा अभी भी मजबूत है। यदि किसी किसान के खेत में निराई-गुड़ाई का काम समय पर पूरा नहीं हो पाता है, तो गांव के लोग एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आते हैं। ग्रामीणों का यह सहयोग आपसी भाईचारे और सामूहिक श्रम की भावना को दर्शाता है।
सावन में बढ़ जाता है कृषि कार्य
सावन के दिनों में क्षेत्र में कृषि कार्य तेजी पकड़ लेते हैं। खेतों में मक्का, राजमा, अदरक, अरबी समेत अन्य पारंपरिक फसलों की देखभाल और निराई-गुड़ाई का सिलसिला चलता रहता है। इसी कृषि चक्र के बीच मंडवा की निराई-गुड़ाई पूरी होने पर ग्रामीण नैटावण पर्व मनाते हैं।
स्मालटा गांव में भी मंडवा की निराई-गुड़ाई पूरी हो चुकी है। ग्रामीणों के अनुसार करीब एक दशक पहले गांव के हर परिवार के पास चार से दस खेतों में पारंपरिक फसल बोई जाती थी। उस समय मंडवा की बुआई बड़े पैमाने पर होती थी, लेकिन अब इसका रकबा लगातार घटकर एक-दो खेतों तक सीमित होता जा रहा है।
पौष्टिकता के कारण मंडवा की बढ़ रही मांग
बदलते समय में किसान नकदी फसलों जैसे टमाटर, बींस, अरबी, अदरक और राजमा की खेती पर अधिक जोर दे रहे हैं। इसके बावजूद मंडवा की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि कोदो का आटा ताकतवर माना जाता है और कई बीमारियों में भी इसके उपयोग को लाभकारी समझा जाता है।
नैटावण पर्व के अवसर पर गांवों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। नौकरी और रोजगार के लिए बाहर रहने वाले लोग भी इस अवसर पर अपने गांव लौटकर परिवार और ग्रामीणों के साथ पर्व मनाते हैं। इससे गांवों में खुशी और उत्साह का माहौल बनता है।
जौनसार-बावर में कोदो की नैटावण केवल एक कृषि पर्व नहीं, बल्कि पारंपरिक खेती, सामूहिक श्रम, लोकसंस्कृति और ग्रामीण भाईचारे को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण परंपरा है। बदलते दौर में खेती का रकबा भले कम हो रहा हो, लेकिन ग्रामीणों की कोशिश है कि इस पारंपरिक पर्व और स्थानीय कृषि संस्कृति की पहचान आने वाली पीढ़ियों तक बनी रहे।
