इंजीनियरिंग डे पर मोरी के ढाटमीर में लकड़ी के पैदल पुल पर दौड़ रहे भारी वाहन

पैदल आवाजाही के लिए बनाए गए पुल पर हैवी वाहन देख उठे सुरक्षा के सवाल, ग्रामीणों की मजबूरी का स्थायी समाधान कब?

उत्तरकाशी। इंजीनियरिंग डे के मौके पर उत्तरकाशी जिले के सीमांत विकासखंड मोरी से सामने आया एक दृश्य सरकारी व्यवस्थाओं और ग्रामीणों की मजबूरियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मोरी क्षेत्र के ढाटमीर गांव को जोड़ने वाले नाले पर ग्रामीणों ने पैदल आवाजाही के लिए लकड़ी का पुल तैयार किया है। अब इसी पुल से भारी वाहनों की आवाजाही का मामला सामने आया है।

ग्रामीणों की सुविधा के लिए तैयार किया गया यह लकड़ी का पैदल पुल सामान्य तौर पर केवल पैदल आने-जाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए, लेकिन क्षेत्र में सड़क संपर्क की चुनौती के बीच इस पर भारी वाहनों को गुजरते हुए देखा जा रहा है। ऐसे में पुल की मजबूती और उस पर सफर करने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

पैदल पुल पर भारी वाहन, हादसे का खतरा

लकड़ी से बने अस्थायी पुल पर जहां पैदल राहगीरों को भी कदम संभालकर चलना पड़ता है, वहीं भारी वाहन गुजरने से किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। सवाल यह भी है कि यदि पुल को भारी वाहनों का भार सहने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है, तो आखिर इन वाहनों को इस रास्ते से गुजरने की अनुमति कैसे मिल रही है?

ग्रामीणों का कहना है कि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और संपर्क सुविधाओं की कमी के कारण कई बार उन्हें मजबूरी में ऐसे वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन मजबूरी का यह समाधान कब तक लोगों की जान जोखिम में डालकर जारी रहेगा, यह बड़ा सवाल है।

प्रशासन से स्थायी समाधान की मांग

ढाटमीर गांव को बेहतर और सुरक्षित सड़क संपर्क उपलब्ध कराने के साथ ही नाले पर मजबूत एवं सुरक्षित पुल निर्माण की जरूरत महसूस की जा रही है। ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर स्थिति का आकलन करे और भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित करे।

इंजीनियरिंग डे पर सामने आया यह मामला सिर्फ एक लकड़ी के पुल की कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ों में बुनियादी ढांचे और ग्रामीणों की जमीनी समस्याओं की तस्वीर भी पेश करता है। विकास तभी सार्थक होगा, जब वह कागजों से निकलकर सुरक्षित तरीके से जमीन पर दिखाई दे।

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