अष्टमी पर मां काली की आराधना से जीवंत है जौनसारी लोकसंस्कृति; परिवार के मुखिया के व्रत, नए वस्त्रों और दूध-चावल के टीके की परंपरा ने कायम रखी विशिष्ट पहचान
दीवान सिंह तोमर |दून वैली टाइम्स | विशेष रिपोर्ट
देहरादून, उत्तराखंड। भारत की सांस्कृतिक विविधता में उत्तराखंड के जौनसार-बावर की लोकपरंपराएं अपनी अलग पहचान रखती हैं। देश के अधिकांश हिस्सों में शारदीय नवरात्र नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना के साथ मनाए जाते हैं, वहीं जौनसार-बावर के अनेक गांवों में अष्टमी की पूजा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यहां स्थानीय लोकमान्यताओं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के अनुसार मां काली की आराधना की जाती है। जौनसारी समाज में अष्टमी से जुड़ी इस विशिष्ट परंपरा को ‘आठों पर्व’ के नाम से जाना जाता है।
यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान या व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र की पारिवारिक आस्था, सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। पूजा-पद्धति, पारंपरिक रीति-रिवाजों और परिवार के सदस्यों की सहभागिता के माध्यम से यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच भी ऐसी लोकपरंपराओं का कायम रहना जौनसार-बावर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करता है।
अष्टमी पर मां काली की आराधना, परिवार की सुख-समृद्धि की कामना
जौनसार-बावर में ‘आठों पर्व’ के अवसर पर मां काली की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, परिवार के मुखिया द्वारा व्रत रखकर देवी की आराधना की जाती है। घरों में पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार पूजा की जाती है और हलवा-पूरी सहित प्रसाद तैयार किया जाता है। परिवार के अन्य सदस्य भी धार्मिक अनुष्ठानों में अपनी सहभागिता निभाते हैं।
स्थानीय लोकविश्वास में मां काली की आराधना परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक एकजुटता का अवसर भी बनता है। घर के सदस्य एक साथ पूजा में शामिल होकर अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाते हैं।
नए वस्त्र धारण करने और दूध-चावल का टीका लगाने की अनूठी रस्म
‘आठों पर्व’ की पहचान इससे जुड़ी पारंपरिक रस्मों से भी होती है। स्थानीय महिलाओं के अनुसार, इस अवसर पर धार्मिक नियमों का पालन करते हुए पूजा-अर्चना की जाती है। व्रत रखने वाले लोग पूजा के समय नए वस्त्र धारण करते हैं। परिवार में दूध और चावल का टीका लगाने की परंपरा भी निभाई जाती है, जो स्थानीय रीति-रिवाजों का हिस्सा है।
स्थानीय महिलाओं सुनीता देवी, रीना चौहान, प्रभा देवी, विमला देवी, अनिता देवी, सविता देवी, रविता देवी, कांता देवी, प्रमिला देवी, नारी देवी, सुभा देवी, भोटो देवी और अनारी देवी ने बताया कि जौनसारी परंपरा में अष्टमी के इस आयोजन को ‘आठों पर्व’ कहा जाता है। उनके अनुसार, इस पर्व के माध्यम से परिवार अपनी पुरानी मान्यताओं, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा रहता है।
पीढ़ियों से चली आ रही लोकआस्था, संकटों से सुरक्षा की कामना
जौनसार-बावर के ग्रामीण समाज में देवी-देवताओं की आराधना का जीवन से गहरा संबंध रहा है। क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार, पहले गांवों में बीमारियों, प्राकृतिक संकटों और अन्य विपत्तियों से बचाव की कामना के साथ धार्मिक अनुष्ठान किए जाते थे। मां काली की पूजा को भी स्थानीय लोकविश्वास में परिवार और समुदाय के कल्याण से जोड़कर देखा जाता है।
समय के साथ सामाजिक जीवन में अनेक बदलाव आए हैं, लेकिन धार्मिक आस्था और पारंपरिक पर्वों का महत्व आज भी बना हुआ है। ‘आठों पर्व’ इसी सांस्कृतिक निरंतरता का उदाहरण है, जिसमें पुरानी मान्यताएं, पारिवारिक परंपराएं और सामुदायिक पहचान एक साथ दिखाई देती हैं।
लोकभाषा, खानपान और रीति-रिवाजों में रची-बसी जौनसारी पहचान
जौनसार-बावर की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है। यहां की लोकभाषा, पारंपरिक वेशभूषा, खानपान, सामाजिक व्यवस्थाएं और धार्मिक आयोजन इस क्षेत्र को विशिष्ट बनाते हैं। स्थानीय पर्वों और परंपराओं के माध्यम से यहां के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखते हैं।
‘आठों पर्व’ जैसी परंपराएं यह संदेश देती हैं कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर केवल बड़े धार्मिक आयोजनों, मंदिरों और प्रसिद्ध तीर्थस्थलों तक सीमित नहीं है। गांवों और स्थानीय समुदायों में सदियों से प्रचलित रीति-रिवाज भी देश की सांस्कृतिक विविधता के महत्वपूर्ण आधार हैं।
आधुनिकता के दौर में लोकविरासत के संरक्षण की जरूरत
बदलती जीवनशैली, रोजगार के लिए पलायन और आधुनिक सामाजिक परिवेश का प्रभाव ग्रामीण समाज पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में स्थानीय परंपराओं का दस्तावेजीकरण, बुजुर्गों के अनुभवों का संकलन और बच्चों तथा युवाओं को अपनी संस्कृति से परिचित कराना जरूरी है।
जौनसार-बावर का ‘आठों पर्व’ इस बात का उदाहरण है कि लोकसंस्कृति किसी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति और सामाजिक पहचान को किस प्रकार संजोकर रखती है। ऐसी परंपराओं को समझना और उनका सम्मान करना उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
देश की सांस्कृतिक विविधता में जौनसार-बावर की अलग पहचान
भारत में एक ही धार्मिक पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय मान्यताओं और परंपराओं के अनुरूप मनाया जाता है। कहीं दुर्गा पूजा के भव्य आयोजन होते हैं, कहीं गरबा और डांडिया की धूम रहती है, तो कहीं पारंपरिक पूजा-पद्धतियां धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं।
इसी विविधता के बीच जौनसार-बावर का ‘आठों पर्व’ अपनी अलग पहचान रखता है। अष्टमी पर मां काली की आराधना, परिवार के मुखिया का व्रत, नए वस्त्र धारण करने और दूध-चावल का टीका लगाने जैसी परंपराएं स्थानीय लोकजीवन की विशिष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।
यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि जौनसार-बावर की सांस्कृतिक स्मृति, पारिवारिक परंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही लोकविरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस परंपरा को सहेजना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना उत्तराखंड की बहुरंगी संस्कृति को संरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
