किशाऊ बांध को लेकर क्वानू क्षेत्र में विरोध तेज

ग्रामीण बोले—पुश्तैनी घर-जमीन और आजीविका की कीमत पर कैसा विकास?

चकराता, विकासनगर। टोंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर क्वानू और आसपास के क्षेत्रों में ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना के कारण उनके पुश्तैनी गांव, कृषि भूमि, घर और आजीविका प्रभावित होने की आशंका है। इसी चिंता को लेकर क्षेत्रवासी सरकार से स्पष्ट जवाब और प्रभावित परिवारों के अधिकारों एवं भविष्य को लेकर ठोस आश्वासन की मांग कर रहे हैं।

हाल ही में क्वानू क्षेत्र में किशाऊ बांध के विरोध में ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने अपने हाथों में तख्तियां लेकर परियोजना के खिलाफ आवाज उठाई और मांग की कि प्रभावित गांवों में खुली सुनवाई कर स्थानीय लोगों की आपत्तियों को गंभीरता से सुना जाए।

तीन गांवों को लेकर ग्रामीणों में विशेष चिंता

ग्रामीणों का कहना है कि मैलोत क्वानू, मंझगांव क्वानू और कोटा क्वानू सहित क्षेत्र के गांव परियोजना से प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि यह केवल मकानों के डूबने का सवाल नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जमीन, खेती-किसानी, पशुपालन और स्थानीय जीवन व्यवस्था के अस्तित्व का प्रश्न है।

ग्रामीणों के अनुसार उनके दादा-परदादा के समय से टोंस नदी और आसपास की उपजाऊ जमीन उनके जीवन और आजीविका का प्रमुख आधार रही है। खेती और पशुपालन पर निर्भर परिवारों को आशंका है कि यदि कृषि भूमि प्रभावित हुई तो विस्थापन के साथ-साथ उनके रोजगार का संकट भी खड़ा हो सकता है।

सरकार का पक्ष—छह राज्यों को मिलेगा लाभ

किशाऊ परियोजना को केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों की ओर से एक बहुउद्देशीय परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। 15 सितंबर 2026 को केंद्र और छह यमुना बेसिन राज्यों के बीच परियोजना को लेकर समझौता हुआ। परियोजना में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली शामिल हैं।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार टोंस नदी पर लगभग 232.6 मीटर ऊंचा बांध प्रस्तावित है। परियोजना की जल भंडारण क्षमता लगभग 1,562 मिलियन घन मीटर बताई गई है। इससे करीब 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई, लगभग 1,476 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन तथा दिल्ली सहित संबंधित क्षेत्रों के लिए जल उपलब्धता का लक्ष्य रखा गया है।

लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का सवाल—हमारे घर और रोजगार का क्या?

ग्रामीणों का कहना है कि वे देश के विकास और बिजली-पानी की जरूरतों को समझते हैं, लेकिन विकास की प्रक्रिया में जिन परिवारों की जमीन और घर प्रभावित होंगे, उनके भविष्य की जिम्मेदारी भी सरकार को स्पष्ट रूप से तय करनी चाहिए।

ग्रामीणों की मांग है कि विस्थापन, पुनर्वास, मुआवजा, जमीन के बदले जमीन, रोजगार तथा प्रभावित परिवारों के अधिकारों को लेकर स्पष्ट और लिखित व्यवस्था सामने रखी जाए।

किशाऊ कॉरपोरेशन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार परियोजना के कारण उत्तराखंड में 9 और हिमाचल प्रदेश में 8 गांवों के प्रभावित होने तथा क्रमशः 3,406 और 2,092 लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता का उल्लेख है। आधिकारिक आंकड़ों में कुल 17 गांव और 5,498 लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता बताई गई है।

ग्रामीणों ने उठाए सर्वे और संवाद पर सवाल

अगस्त 2026 में किशाऊ बांध प्रभावित जन कल्याण संघर्ष समिति, क्वानू ने परियोजना के सर्वेक्षण कार्य के लिए जारी निविदा को निरस्त करने की मांग भी उठाई थी। समिति ने आरोप लगाया था कि ग्रामीणों की आपत्तियों और पूर्व में हुए संवाद के बावजूद पर्याप्त चर्चा के बिना आगे की कार्रवाई की जा रही है। समिति ने आरटीआई के माध्यम से मांगी गई सूचनाओं को पूर्ण रूप से उपलब्ध कराने की मांग भी की थी।

ग्रामीणों की दो टूक—बिना उचित समाधान के स्वीकार नहीं होगा विस्थापन

क्षेत्रवासियों का कहना है कि उनके लिए यह केवल एक परियोजना का मामला नहीं है, बल्कि उनकी जमीन, घर, खेत, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।

ग्रामीणों ने कहा कि वे अपने आशियाने और पुश्तैनी संपत्ति को उजड़ते हुए नहीं देखना चाहते। उन्होंने सरकार से मांग की है कि परियोजना से जुड़े प्रत्येक निर्णय से पहले प्रभावित लोगों को विश्वास में लिया जाए और उनकी आपत्तियों का समाधान किया जाए।

ग्रामीणों का संदेश स्पष्ट है—

**“क्वानू पूछता है—सरकार जवाब दो।

हमारी जमीन, हमारे घर और हमारी आजीविका का भविष्य क्या होगा?”**

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