UPI शुल्क पर अशनीर ग्रोवर के सवाल, बोले—‘₹22,000 करोड़ का बोझ क्यों?’

नई दिल्ली/ देहरादून। UPI पर संभावित शुल्क को लेकर बहस के बीच भारतपे के सह-संस्थापक और शार्क टैंक इंडिया के पूर्व जज अशनीर ग्रोवर ने सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं। 15 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया देते हुए ग्रोवर ने UPI के आर्थिक मॉडल और उस पर शुल्क लगाए जाने की जरूरत पर सवाल खड़े किए। 

ग्रोवर का तर्क है कि UPI देश के डिजिटल भुगतान तंत्र की बड़ी उपलब्धि है और इसके संचालन तथा विस्तार की लागत को देखते हुए सरकार और संबंधित संस्थाओं को शुल्क लगाने के विकल्प पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि UPI को लंबे समय तक सब्सिडी के माध्यम से चलाया जा सकता है, तो उपयोगकर्ताओं और कारोबारियों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की जरूरत क्यों पड़ रही है। 

क्या है ₹22,000 करोड़ का मामला?

इसी बीच UPI के मुद्रीकरण को लेकर Bernstein की एक रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि 40 बेसिस पॉइंट MDR को UPI के लगभग आधे लेनदेन मूल्य पर लागू करने की स्थिति में वित्त वर्ष 2027-28 तक करीब ₹22,000 करोड़ का वार्षिक राजस्व पूल बन सकता है। यह आंकड़ा UPI से संभावित राजस्व का अनुमान है, न कि सरकार द्वारा वसूले गए टैक्स की राशि। 

UPI शुल्क को लेकर सरकार का क्या कहना है?

वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि आम नागरिकों के लिए UPI भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और P2P लेनदेन मुफ्त रहेंगे। सरकार के अनुसार संभावित MDR केवल सीमित श्रेणी के बड़े मर्चेंट लेनदेन पर लागू होगा और इसका उद्देश्य UPI इकोसिस्टम को लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है। 

ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट UPI लेनदेन पर 0.4% MDR लागू करने की व्यवस्था की गई है। यह शुल्क उपभोक्ता से सीधे वसूलने के लिए नहीं है। छोटे कारोबारियों के लिए भी कुछ छूट का प्रावधान है। 

NPCI के आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में UPI पर करीब 24,509 मिलियन यानी 2,450.9 करोड़ लेनदेन हुए, जिनकी कुल राशि लगभग ₹29.82 लाख करोड़ रही। 

यानी UPI शुल्क को लेकर बहस अब सिर्फ डिजिटल पेमेंट की कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भविष्य के वित्तीय मॉडल और इसे लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के सवाल से भी जुड़ गई है।

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