देहरादून। राजधानी देहरादून में करीब 21 साल पुराने संपत्ति विवाद ने अब आपराधिक मुकदमे का रूप ले लिया है। कोतवाली नगर पुलिस ने कथित फर्जी वसीयत तैयार कर करोड़ों रुपये की संपत्ति हड़पने, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में चार लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। मामला दिवंगत कुंवर चंद्र बहादुर सिंह की संपत्तियों और उनकी दत्तक पुत्री मानी जाने वाली उपासना मेहता के अधिकारों से जुड़ा है।
पुलिस के अनुसार, कोतवाली नगर में दर्ज एफआईआर संख्या 0248/2026 में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। शिकायत अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने दर्ज कराई है, जिन्होंने स्वयं को बेंगलुरु निवासी उपासना मेहता का पंजीकृत मुख्तारआम बताया है।
दत्तक पुत्री के अधिकारों का दावा
शिकायत में कहा गया है कि उपासना मेहता बचपन से स्वर्गीय कुंवर चंद्र बहादुर सिंह के साथ रहती थीं और उन्हें दत्तक पुत्री की तरह माना जाता था। न्यायालय ने भी चंद्र बहादुर सिंह को उनका संरक्षक नियुक्त किया था। वर्ष 2001 में उनके निधन के समय उपासना नाबालिग थीं, जिसके बाद कमल प्रसाद को उनका संरक्षक बनाया गया।
2023 में सामने आई वसीयत की जानकारी
एफआईआर के अनुसार, वर्ष 2023 में उपासना मेहता को जानकारी मिली कि कुंवर चंद्र बहादुर सिंह ने अपनी वसीयत में बड़ी मात्रा में संपत्ति उनके नाम छोड़ी थी। बताया गया कि इस वसीयत के निष्पादक अधिवक्ता मनोजित सिन्हा थे, जिन्होंने बाद में मूल वसीयत जिला जज न्यायालय में जमा कर स्वयं को निष्पादक पद से अलग करने की इच्छा जताई। उनका निधन 25 नवंबर 2025 को हो गया।
ट्रस्ट के खाते से रकम निकालने का आरोप
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुंवर चंद्र बहादुर सिंह ने “उपासना मेहता ट्रस्ट” बनाया था, जिसके नाम से बैंक ऑफ बड़ौदा में खाता संचालित होता था। आरोप है कि वर्ष 2019 में कमल प्रसाद ने खाते से करीब पांच लाख रुपये निकालकर खाता बंद करा दिया और पूरी राशि का गबन कर लिया।
मृत्यु के बाद तैयार हुई कथित फर्जी वसीयत
मामले का सबसे गंभीर आरोप दूसरी कथित फर्जी वसीयत को लेकर है। शिकायत के अनुसार, कुंवर चंद्र बहादुर सिंह ने 21 अगस्त 2001 को एक वसीयत बनाई थी, जिसे 1 सितंबर 2001 को पंजीकृत कराया गया। लेकिन उनके निधन के बाद 2 सितंबर 2001 की तारीख वाली एक दूसरी वसीयत तैयार कर दी गई, जिसके आधार पर उनकी संपत्तियां कमल प्रसाद और कुमुद वैद्य ने अपनी मां और मौसी के नाम दर्ज करा लीं। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह वसीयत मृत्यु के बाद तैयार की गई थी और इसका कभी पंजीकरण नहीं हुआ।
गवाहों और संपत्ति समझौते का भी उल्लेख
एफआईआर में कथित फर्जी वसीयत के गवाह के रूप में उदशी और जगराज मान के नाम दर्ज होने का उल्लेख है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि पहले की वैध वसीयत के तहत कुछ संपत्तियां आरती कुमार के पुत्र और पुत्री के नाम थीं, जिनको लेकर बाद में समझौता भी हुआ।
चार लोगों के खिलाफ मुकदमा
पुलिस ने इस मामले में कमल प्रसाद, कुमुद वैद्य, उदशी और जगराज मान को आरोपी बनाया है। आरोप है कि सभी ने सुनियोजित साजिश के तहत जाली दस्तावेज तैयार कर संपत्तियों की खरीद-फरोख्त और हेराफेरी की।
पुलिस जांच शुरू
कोतवाली नगर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच उपनिरीक्षक संदीप कुमार को सौंपी है। जांच के दौरान दो दशक पुराने संपत्ति हस्तांतरण, वसीयत, बैंक खातों और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल की जाएगी। पुलिस का कहना है कि जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला वास्तव में फर्जीवाड़े और संपत्ति हड़पने का है या लंबे समय से चले आ रहे उत्तराधिकार विवाद का।
नोट: यह मुकदमा शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया है। लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।




