सिर्फ राहत सामग्री नहीं, अब तकनीक से आपदा का खतरा रोकने की तैयारी

धराली-थराली से जोशीमठ तक सरकार का नया आपदा प्रबंधन मॉडल, राहत के साथ पुनर्वास और आपदा रोधी बुनियादी ढांचे पर जोर

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार सामने आ रही भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, अतिवृष्टि और भू-धंसाव जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बीच राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अब आपदा आने के बाद केवल राहत और बचाव तक सीमित रहने के बजाय पूर्व चेतावनी प्रणाली, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अध्ययन, मजबूत बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक पुनर्वास पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार ने धराली, थराली और जोशीमठ जैसे आपदा प्रभावित क्षेत्रों में राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं लागू की हैं। सरकार का फोकस प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता देने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए मजबूत और आपदा रोधी व्यवस्थाएं विकसित करने पर है।

धराली-थराली में राहत और पुनर्निर्माण पर 33 करोड़ से अधिक

धराली और थराली क्षेत्र में आई भीषण बाढ़, मलबे के बहाव और प्राकृतिक आपदा के बाद राहत एवं पुनर्निर्माण कार्यों को प्राथमिकता दी गई। आपदा के बाद राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ), भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन की टीमें राहत एवं बचाव अभियान में जुटीं।

प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल भोजन, चिकित्सा सहायता और आवश्यक सामग्री पहुंचाई गई। इसके बाद आपदा में क्षतिग्रस्त सड़कों, पेयजल लाइनों, बिजली व्यवस्था, सिंचाई नहरों और अन्य आवश्यक बुनियादी सुविधाओं को दोबारा बहाल करने का काम शुरू किया गया।

आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और लोगों की आजीविका बहाल करने के लिए 33 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई। इसमें 16 करोड़ रुपये से अधिक की राशि पशुपालन, सिंचाई, उद्यान, कृषि, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, पर्यटन, लोक निर्माण और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति जैसे विभागों के माध्यम से विभिन्न कार्यों पर खर्च की गई है।

वहीं, राहत उपायों के तहत 17 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्रभावित परिवारों को सीधे उपलब्ध कराई गई, ताकि वे आपदा के बाद अपने जीवन को दोबारा पटरी पर ला सकें।

किसानों और पशुपालकों को भी राहत

पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक प्रभाव कृषि, बागवानी और पशुपालन पर पड़ता है। इसे देखते हुए सरकार ने प्रभावित किसानों और पशुपालकों के लिए भी विशेष सहायता उपलब्ध कराई।

क्षतिग्रस्त सेब के बगीचों के नुकसान की भरपाई के साथ किसानों को बीज, पौध और कृषि उपकरण उपलब्ध कराए गए। भेड़ और बकरी पालन से जुड़े परिवारों को भी आर्थिक सहायता दी गई, ताकि उनकी आजीविका दोबारा शुरू हो सके।

सरकार का प्रयास है कि राहत राशि मिलने के बाद प्रभावित परिवार लंबे समय तक सरकारी सहायता पर निर्भर न रहें, बल्कि अपनी कृषि, बागवानी और पशुपालन गतिविधियों के माध्यम से दोबारा आत्मनिर्भर बन सकें।

अब आपदा आने से पहले मिलेगी चेतावनी

उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। राज्य में अर्ली वार्निंग सिस्टम, मौसम निगरानी और ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म को मजबूत किया जा रहा है। मानसून से पहले संवेदनशील क्षेत्रों की समीक्षा और तैयारियों को लेकर नियमित अभ्यास भी किए जा रहे हैं।

भूस्खलन और बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में सुरक्षा दीवारों, नदी तटों के तटबंध, जल निकासी व्यवस्था और टिकाऊ इंजीनियरिंग तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।

इसका उद्देश्य सिर्फ आपदा के बाद सड़क और पुल बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी संरचनाएं तैयार करना है जो भविष्य में भीषण बारिश, बाढ़ और मलबे के बहाव जैसी परिस्थितियों का सामना कर सकें।

धराली को लेकर सरकार का बड़ा फोकस

धराली में आई आपदा के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों के साथ समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया कि पुनर्निर्माण को केवल सरकारी निर्माण कार्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। प्रभावित परिवारों के भविष्य और क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए योजनाएं तैयार करने की जरूरत है।

सरकार का लक्ष्य भागीरथी घाटी को अधिक सुरक्षित, मजबूत और आर्थिक रूप से सक्षम क्षेत्र के रूप में विकसित करना है। इसके लिए राहत कार्यों के साथ-साथ सड़क, पेयजल, बिजली, पर्यटन और आजीविका से जुड़े बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।


जोशीमठ में भू-धंसाव के बाद अपनाई गई वैज्ञानिक रणनीति

दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 में जोशीमठ में भू-धंसाव की घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान उत्तराखंड की संवेदनशील पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों की ओर खींचा था। इसके बाद सरकार ने प्रभावित परिवारों को तत्काल सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के साथ दीर्घकालिक पुनर्वास की दिशा में कदम उठाए।

असुरक्षित मकानों में रह रहे परिवारों को होटल, स्कूल, गेस्ट हाउस और गुरुद्वारों में बनाए गए राहत शिविरों में स्थानांतरित किया गया। जोशीमठ क्षेत्र को खतरे के स्तर के आधार पर डेंजर, बफर और सुरक्षित जोन में विभाजित किया गया।

अत्यधिक क्षतिग्रस्त भवनों, जिनमें होटल मलारी इन और होटल माउंट व्यू जैसी इमारतें शामिल थीं, को वैज्ञानिक पद्धति से ध्वस्त किया गया।

प्रभावित परिवारों को किराया और अंतरिम राहत

जोशीमठ के प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत के तौर पर 4,000 रुपये प्रतिमाह किराया भत्ता और 1.50 लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई। प्रभावित क्षेत्र के निवासियों के बिजली और पानी के बिलों में भी राहत दी गई।

वैज्ञानिक मूल्यांकन होने तक एनटीपीसी तपोवन-विष्णुगाड परियोजना की सुरंग और हेलंग-मारवाड़ी बाईपास से जुड़े कार्यों को भी रोक दिया गया था।

पुनर्वास के लिए दिए गए तीन विकल्प

दीर्घकालिक पुनर्वास के लिए प्रभावित परिवारों के सामने तीन विकल्प रखे गए। पहले विकल्प में क्षतिग्रस्त भूमि और भवन के बदले नकद मुआवजे की व्यवस्था की गई। दूसरे विकल्प में 75 वर्ग मीटर तक भूमि के साथ भवन निर्माण के लिए मुआवजा देने का प्रावधान रखा गया।

तीसरे विकल्प में सुरक्षित स्थान पर सरकार द्वारा निर्मित आवास उपलब्ध कराने की व्यवस्था शामिल की गई। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए भी इसी प्रकार की पुनर्वास व्यवस्था तैयार की गई।

वैज्ञानिक संस्थाओं ने किया भू-संरचना का अध्ययन

जोशीमठ की वास्तविक स्थिति और भविष्य के खतरे का आकलन करने के लिए देश की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाओं की मदद ली गई। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, सीएसआईआर-सीबीआरआई और आईआईटी रुड़की जैसी संस्थाओं ने क्षेत्र की भू-संरचना और आपदा के कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन किया।

इन अध्ययनों और विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर जोशीमठ के पुनर्वास और पुनर्निर्माण की व्यापक योजना तैयार की गई।

जोशीमठ पुनर्वास के लिए 1,658.17 करोड़ रुपये

जोशीमठ के प्रभावित क्षेत्र के पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए 1,658.17 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी गई। इसमें केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और राज्य बजट सहित विभिन्न स्रोतों से सहयोग लिया जा रहा है।

आपदा प्रबंधन में राहत से आगे बढ़ने की कोशिश

उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से संवेदनशील राज्य में प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अध्ययन, मजबूत निर्माण मानकों और समय रहते चेतावनी के जरिए इनके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

धराली-थराली से लेकर जोशीमठ तक सरकार की मौजूदा रणनीति में अब राहत के साथ पुनर्वास, पुनर्निर्माण के साथ जोखिम कम करने और विकास के साथ आपदा रोधी बुनियादी ढांचा तैयार करने पर जोर दिखाई दे रहा है।

उत्तराखंड के लिए आने वाले वर्षों में यही चुनौती होगी कि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास कार्यों को पर्यावरणीय संवेदनशीलता और वैज्ञानिक मानकों के साथ आगे बढ़ाया जाए, ताकि सड़क, पुल, भवन और अन्य निर्माण भविष्य की आपदाओं के सामने ज्यादा सुरक्षित साबित हों।

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