प्रेमनगर में खनन की आड़ में मशीनों का खेल? नियमों पर सवाल, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर उठी उंगलियां

कैलाश रिवर बेड माइनिंग कंपनी के बताए जा रहे खनन पट्टे पर जेसीबी जैसी भारी मशीनों के इस्तेमाल के आरोप; अनुमति, खनन की मात्रा और पर्यावरणीय शर्तों की जांच की मांग

देहरादून। राजधानी देहरादून के प्रेमनगर क्षेत्र में खनन गतिविधियों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अवैध खनन के खिलाफ जिलाधिकारी की सख्ती के बीच कैलाश रिवर बेड माइनिंग कंपनी के बताए जा रहे खनन पट्टे पर जेसीबी जैसी भारी मशीनों से उपखनिज निकालने के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि नदी क्षेत्र में मशीनों के माध्यम से दिन-रात खनन कार्य किया जा रहा है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और संबंधित कंपनी का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

मामले ने खनन विभाग की निगरानी व्यवस्था, पट्टे की शर्तों के अनुपालन और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग मौके पर निरीक्षण कर स्थिति स्पष्ट करता है या नहीं।

मशीनों के इस्तेमाल की अनुमति है या नहीं?

खनन पट्टे पर भारी मशीनों का इस्तेमाल अपने आप में नियमों का उल्लंघन है या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित पट्टे की स्वीकृत खनन योजना, पर्यावरणीय स्वीकृति और लागू नियमों एवं शर्तों के आधार पर किया जाना जरूरी है। ऐसे में सबसे अहम सवाल यह है कि प्रेमनगर स्थित बताए जा रहे खनन पट्टे पर मशीनों के संचालन की अनुमति है या नहीं और यदि अनुमति है, तो क्या उसका इस्तेमाल निर्धारित शर्तों के अनुरूप हो रहा है?

जिला खान अधिकारी देहरादून से यह स्पष्ट करने की अपेक्षा है कि क्या इस मामले में अब तक कोई निरीक्षण किया गया है? क्या खनन क्षेत्र की सीमाओं और गहराई की पैमाइश हुई है? क्या स्वीकृत खनन मात्रा का वास्तविक निकासी से मिलान किया गया है? इन सवालों के जवाब सामने आने से ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

खनन निदेशालय की निगरानी पर भी सवाल

राजधानी में खनन गतिविधियों पर निगरानी की जिम्मेदारी संबंधित विभागीय अधिकारियों की है। ऐसे में प्रदेश के खनन निदेशक राजपाल लेघा से भी मामले की जांच और विभागीय निगरानी व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की अपेक्षा है।

यदि मौके पर नियमों के विपरीत मशीनों का इस्तेमाल, निर्धारित सीमा से अधिक खनन या अन्य अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि खनन कार्य निर्धारित नियमों के अनुरूप हो रहा है, तो विभाग को उपलब्ध अनुमति, निरीक्षण और अनुपालन संबंधी तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

कानून क्या कहता है?

खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 4(1A) खनिजों के परिवहन और भंडारण से संबंधित लागू नियमों के अनुपालन से जुड़ी है, जबकि धारा 21 में अधिनियम के उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान हैं। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड में लागू खनन संबंधी नियमों तथा स्वीकृत पट्टा शर्तों का पालन भी आवश्यक है।

पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त परियोजनाओं के मामले में पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और संबंधित स्वीकृति की शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, किसी विशेष पट्टे पर कौन-सी शर्तें लागू हैं और उनका उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह संबंधित दस्तावेजों एवं तकनीकी जांच के बाद ही तय किया जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी चिंता

नदी क्षेत्र में खनन के दौरान स्वीकृत सीमा, गहराई, निर्धारित कार्यप्रणाली और पर्यावरणीय शर्तों का पालन महत्वपूर्ण है। अनियंत्रित या निर्धारित सीमा से अधिक खनन होने पर नदी क्षेत्र और आसपास के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

इसलिए मामले में केवल मशीनों की मौजूदगी की जांच पर्याप्त नहीं होगी। खनन पट्टे की सीमाओं, निकाले गए उपखनिज की मात्रा, खनन की गहराई, ई-रवन्ना अभिलेखों तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों की भी जांच की जानी चाहिए।

संयुक्त जांच की उठ रही मांग

मामले की निष्पक्ष स्थिति सामने लाने के लिए खनन विभाग, राजस्व प्रशासन और संबंधित पर्यावरणीय प्राधिकरण के स्तर पर नियमानुसार संयुक्त निरीक्षण कराए जाने की मांग महत्वपूर्ण है। जांच के दौरान निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है—

  • खनन पट्टे की स्वीकृत सीमाओं और मशीनों के इस्तेमाल की अनुमति की जांच।
  • खनन की निर्धारित गहराई और वास्तविक निकासी का तकनीकी सत्यापन।
  • स्वीकृत खनन मात्रा, ई-रवन्ना और परिवहन संबंधी अभिलेखों का मिलान।
  • पर्यावरणीय स्वीकृति एवं पट्टे की अन्य शर्तों के अनुपालन की पड़ताल।
  • अनियमितताएं प्रमाणित होने पर नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई पर विचार।

जांच के बाद ही तय होगी जिम्मेदारी

प्रेमनगर में सामने आए आरोपों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संबंधित विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है। यदि जांच में अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो लागू कानून और पट्टे की शर्तों के अनुसार जुर्माने सहित अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है। गंभीर उल्लंघन की स्थिति में पट्टे के निलंबन या निरस्तीकरण पर भी संबंधित नियमों के तहत विचार किया जा सकता है।

फिलहाल आरोपों की आधिकारिक पुष्टि, विभागीय जांच की स्थिति और संबंधित कंपनी का पक्ष सामने आना बाकी है। ऐसे में निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय दस्तावेजों, मौके के निरीक्षण और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर तथ्य सामने लाना जरूरी है।

अब देखना यह है कि जिलाधिकारी के अवैध खनन के खिलाफ सख्ती के बीच प्रेमनगर के इस मामले में जांच होती है या नहीं और जिम्मेदार विभाग तथ्यों के आधार पर क्या कार्रवाई करता है।

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