12 साल बाद शुरू हुई मां नंदा की बड़ी जात, कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हुई डोलियां

चमोली। उत्तराखंड की लोक आस्था, संस्कृति और हिमालयी परंपरा की प्रतीक मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा शनिवार, 5 सितंबर 2026 को सिद्धपीठ कुरुड़ से विधिवत शुरू हो गई। मां नंदा की डोलियों के कैलाश की ओर प्रस्थान के साथ ही पूरा क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस ऐतिहासिक धार्मिक यात्रा में शामिल हुए। 

मां नंदा को बेटी मानकर दी जाती है विदाई

उत्तराखंड की लोक परंपरा में मां नंदा को बेटी का दर्जा प्राप्त है। मान्यता है कि नंदा देवी अपने मायके से कैलाश स्थित अपने ससुराल की ओर प्रस्थान करती हैं। इसी भाव के साथ श्रद्धालु कठिन हिमालयी मार्गों पर यात्रा करते हुए मां नंदा की डोली को भावपूर्ण विदाई देते हैं।

यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गढ़वाल की लोक संस्कृति, परंपरा, आस्था और सामुदायिक एकता का अद्भुत संगम मानी जाती है।

चौसिंग्या खाडू बना यात्रा का मार्गदर्शक

नंदा देवी की बड़ी जात की सबसे विशिष्ट परंपरा चौसिंग्या खाडू, यानी चार सींग वाले विशेष मेढ़े की है। लोक मान्यता में इसे मां नंदा का प्रतिनिधि और यात्रा का मार्गदर्शक माना जाता है। इस वर्ष चमोली के सुंग गांव का आठ माह का चौसिंग्या खाडू यात्रा में शामिल है। 

मान्यता के अनुसार यात्रा के अंतिम चरण में चौसिंग्या खाडू को मां नंदा के साथ कैलाश की ओर विदा किया जाता है। इस दुर्लभ परंपरा के कारण भी नंदा देवी की बड़ी जात देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।

करीब 280 किलोमीटर का कठिन हिमालयी सफर

नंदा देवी की यह यात्रा बेहद दुर्गम हिमालयी क्षेत्र से होकर गुजरती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को ऊंचे पहाड़ी रास्तों, बुग्यालों, संकरे पैदल मार्गों और चुनौतीपूर्ण मौसम का सामना करना पड़ता है। यात्रा का प्रमुख धार्मिक गंतव्य होमकुंड माना जाता है। विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए श्रद्धालु मां नंदा की डोली के साथ आगे बढ़ते हैं। 

हिमालयी संस्कृति और आस्था का महापर्व

नंदा देवी बड़ी जात को उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्राओं में गिना जाता है। 12 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद आयोजित होने वाली इस यात्रा में स्थानीय ग्रामीणों के साथ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों और देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने की परंपरा रही है।

ढोल-दमाऊं की गूंज, पारंपरिक वाद्ययंत्र, नंदा के जयकारे और श्रद्धालुओं की आस्था ने चमोली के पहाड़ों को भक्तिमय बना दिया है। यात्रा के दौरान प्रकृति और हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण को भी विशेष महत्व दिया जाता है।

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