गिरधारी लाल साहू की गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग भी खारिज, पत्नी की शिकायत पर दर्ज है गंभीर धाराओं में मुकदमा
देहरादून/नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने देहरादून के कैंट थाने में उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे को निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप सामान्य वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें मारपीट, धोखाधड़ी, दस्तावेजों की कूटरचना, जातिसूचक अपमान और हत्या की साजिश जैसे गंभीर संज्ञेय अपराध शामिल हैं। ऐसे में इस स्तर पर प्राथमिकी निरस्त करने का कोई आधार नहीं बनता।
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि प्राथमिकी में प्रथम दृष्टया गंभीर अपराधों के आरोप सामने आने पर केवल वैवाहिक संबंधों का हवाला देकर आपराधिक जांच को रोका नहीं जा सकता। मामले में पिछले दिन सुनवाई पूरी कर अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया।
पत्नी की शिकायत पर दर्ज हुआ था मुकदमा
मामले के अनुसार, कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने अपने पति गिरधारी लाल साहू के खिलाफ देहरादून के कैंट थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 120-बी, 323, 420, 467, 468, 471, 495, 498-ए, 504 और 506 के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत मुकदमा दर्ज किया था।
शिकायत में रेखा आर्य ने आरोप लगाया कि विवाह के समय गिरधारी लाल साहू ने अपनी पहली शादी और बच्चों से संबंधित जानकारी छिपाई थी। इसके बाद अन्य महिलाओं से संबंध रखने और इसका विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई। शिकायत के अनुसार, उन्हें गाली-गलौज और जातिसूचक अपमानजनक टिप्पणियों का भी सामना करना पड़ा।
फर्जी हस्ताक्षर और हत्या की साजिश के भी आरोप
शिकायत में कंपनी से जुड़े दस्तावेजों में कथित हेराफेरी का आरोप भी लगाया गया है। रेखा आर्य के अनुसार, उनके फर्जी हस्ताक्षर कर दस्तावेज तैयार किए गए और उन्हें कंपनी के निदेशक पद से जबरन सेवानिवृत्त दिखा दिया गया, जबकि उन्होंने कभी इस्तीफा नहीं दिया था।
इसके अतिरिक्त, एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया कि उसमें गिरधारी लाल साहू उन्हें रास्ते से हटाने यानी हत्या की साजिश रचने और इसके लिए धन खर्च करने की बात कर रहे हैं। इन आरोपों के आधार पर रेखा आर्य ने पुलिस से कानूनी कार्रवाई की मांग की थी।
हालांकि, इन सभी आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होना है। हाईकोर्ट ने भी ऑडियो रिकॉर्डिंग की वास्तविकता और कथित फर्जी दस्तावेजों की सत्यता को जांच तथा मुकदमे के दौरान तय होने वाला विषय माना है।
बचाव पक्ष ने बताया वैवाहिक विवाद
हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गिरधारी लाल साहू की ओर से मुकदमे को निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की गई थी। बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि दोनों का विवाह जुलाई 2004 में हुआ था और वे करीब 22 वर्षों से वैवाहिक संबंध में हैं। ऐसे में यह मूल रूप से घरेलू और वैवाहिक विवाद का मामला है, जिसे अब आपराधिक रूप दिया जा रहा है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के सरकारी अधिवक्ता और रेखा आर्य की ओर से पेश अधिवक्ता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने आरोपों की गंभीरता का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता जांच में भी सहयोग नहीं कर रहा है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
22 साल का वैवाहिक संबंध अपराधों की संभावना खत्म नहीं करता
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल इस आधार पर आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता कि दोनों पक्ष लंबे समय से वैवाहिक रिश्ते में हैं। करीब 22 वर्षों का संबंध होने से बाद में हुई कथित क्रूरता और अन्य अपराधों की संभावना समाप्त नहीं हो जाती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंधों की अवधि अपने आप में प्राथमिकी निरस्त करने का पर्याप्त आधार नहीं है। प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की गंभीरता और उनके संज्ञेय अपराध होने के पहलू पर विचार करना आवश्यक है।
अदालत नहीं कर सकती मिनी ट्रायल
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भजनलाल और निहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर मामलों में निर्धारित कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राथमिकी निरस्त करने के स्तर पर अदालत साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण कर मिनी ट्रायल नहीं कर सकती।
अदालत ने कहा कि जब प्राथमिकी में प्रथम दृष्टया गंभीर संज्ञेय अपराध सामने आते हैं, तो केवल आरोपों के आधार पर जांच को रोकना उचित नहीं है। ऑडियो रिकॉर्डिंग की प्रमाणिकता, दस्तावेजों की सत्यता और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण जांच एवं मुकदमे के दौरान किया जाना है।
इन्हीं कानूनी आधारों पर हाईकोर्ट ने गिरधारी लाल साहू की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही मुकदमा निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग भी स्वीकार नहीं की गई।
