2027 से पहले उत्तराखंड BJP में टिकट का ‘महाखेल’!

आधे मौजूदा विधायकों के टिकट पर संकट की चर्चा, सर्वे रिपोर्ट ने बढ़ाई बेचैनी; देहरादून से कुमाऊं तक कई चेहरे रडार पर!

सरकार से ज्यादा विधायकों की नाराजगी ने बढ़ाई चिंता | ‘जीतने की क्षमता’ बनेगी टिकट का सबसे बड़ा पैमाना | नए चेहरों को मिल सकता है बड़ा मौका

देहरादून। दून वैली टाइम्स।

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब छह महीने का वक्त बाकी है, लेकिन सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। सत्ता की हैट्रिक लगाने की तैयारी में जुटी भारतीय जनता पार्टी के भीतर सबसे बड़ा सवाल अब सरकार की वापसी से पहले उम्मीदवारों के चयन को लेकर खड़ा हो गया है।

भाजपा के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में अपने मौजूदा विधायकों का बड़े पैमाने पर टिकट काट सकती है। सूत्रों के हवाले से यह दावा सामने आ रहा है कि करीब 50 फीसदी मौजूदा विधायकों के टिकट बदलने पर पार्टी स्तर पर मंथन चल रहा है।

अगर यह दावा सही साबित होता है तो उत्तराखंड भाजपा के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा टिकट प्रयोग होगा। इसका मतलब होगा कि करीब आधे मौजूदा विधायक अगला विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर नहीं लड़ पाएंगे।

हालांकि, 50 फीसदी टिकट काटने का दावा अभी भाजपा की ओर से आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किया गया है। इसलिए इसे फिलहाल पार्टी के अंदर चल रही चर्चाओं और सूत्रों से सामने आ रही संभावित रणनीति के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

सर्वे रिपोर्ट ने बढ़ाई मौजूदा विधायकों की चिंता

सूत्रों के मुताबिक भाजपा संगठन की ओर से विधानसभा क्षेत्रों में आंतरिक सर्वे और फीडबैक की प्रक्रिया को महत्व दिया जा रहा है। इस दौरान केवल सरकार के कामकाज का आकलन नहीं बल्कि मौजूदा विधायक की व्यक्तिगत स्थिति को भी परखा जा रहा है।

बताया जा रहा है कि सर्वे में जनता और कार्यकर्ताओं से कई महत्वपूर्ण सवालों पर फीडबैक लिया जा रहा है—

विधायक क्षेत्र में कितना सक्रिय है?

जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता कितनी है?

विकास कार्यों को लेकर लोगों की राय क्या है?

कार्यकर्ताओं के साथ विधायक का तालमेल कैसा है?

क्षेत्र में विधायक के खिलाफ नाराजगी कितनी है?

और सबसे अहम—

क्या मौजूदा विधायक 2027 का चुनाव जीत सकता है?

यही आखिरी सवाल भाजपा के टिकट फॉर्मूले में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सरकार से नाराजगी कम, कुछ विधायकों से ज्यादा?

सूत्रों के मुताबिक पार्टी के लिए चिंता का विषय यह फीडबैक बताया जा रहा है कि कुछ विधानसभा क्षेत्रों में लोगों की नाराजगी सरकार से ज्यादा स्थानीय विधायक को लेकर सामने आ रही है।

राजनीतिक तौर पर यह भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण संकेत है।

क्योंकि अगर किसी सीट पर सरकार की योजनाओं का असर सकारात्मक है लेकिन विधायक की व्यक्तिगत छवि कमजोर है, तो पार्टी उस सीट पर उम्मीदवार बदलकर संभावित नुकसान को रोकने की कोशिश कर सकती है।

यानी 2027 में भाजपा का संभावित चुनावी फॉर्मूला केवल “सरकार के काम” तक सीमित नहीं रहने वाला है।

बल्कि हर विधानसभा सीट पर यह देखा जा सकता है कि—

“उम्मीदवार जीत सकता है या नहीं?”

‘विनेबिलिटी’ बनेगी टिकट का सबसे बड़ा पैमाना?

भाजपा के अंदर टिकट को लेकर चल रही चर्चाओं में सबसे ज्यादा जोर विनेबिलिटी यानी चुनाव जीतने की क्षमता पर होने की बात कही जा रही है।

मौजूदा विधायक होने का फायदा तभी मिलेगा, जब पार्टी के सर्वे और जमीनी फीडबैक में उसकी स्थिति मजबूत दिखाई दे।

यदि किसी विधायक की रिपोर्ट लगातार कमजोर आती है और पार्टी को लगता है कि उसके स्थान पर कोई दूसरा उम्मीदवार अधिक मजबूत साबित हो सकता है, तो ऐसे में पुराने चेहरे की जगह नए नाम पर दांव लगाया जा सकता है।

यही वजह है कि भाजपा के कई मौजूदा विधायकों की नजर अब अपने क्षेत्र में होने वाली हर राजनीतिक गतिविधि और संगठनात्मक फीडबैक पर टिकी हुई है।

देहरादून से कुमाऊं तक बदल सकते हैं चेहरे!

सूत्रों की चर्चाओं में कई जिलों को लेकर अलग-अलग तरह के दावे सामने आ रहे हैं।

देहरादून

राजधानी देहरादून की विधानसभा सीटें भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहां कुछ मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन, जनता के बीच पकड़ और संगठनात्मक समीकरणों को लेकर पार्टी स्तर पर समीक्षा की चर्चा है।

अगर बड़े पैमाने पर बदलाव का फैसला होता है तो देहरादून में भी कुछ सीटों पर नए चेहरे दिखाई दे सकते हैं।

पौड़ी और टिहरी

गढ़वाल के पौड़ी और टिहरी जिलों में भी कुछ मौजूदा चेहरों को लेकर पार्टी के स्तर पर मंथन की चर्चा है।

इन जिलों में कई सीटों पर नए दावेदार लंबे समय से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में यदि पार्टी बदलाव के फॉर्मूले को लागू करती है तो यहां टिकट की लड़ाई बेहद दिलचस्प हो सकती है।

अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और बागेश्वर

कुमाऊं क्षेत्र में भी कुछ पुराने और वरिष्ठ चेहरों को लेकर बदलाव की चर्चाएं हैं।

अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और बागेश्वर में पार्टी संगठन स्थानीय समीकरण, जनता की राय और संभावित नए उम्मीदवारों की ताकत का आकलन कर सकता है।

उत्तरकाशी और ऊधमसिंह नगर

इन जिलों में भी नए चेहरों को मौका दिए जाने की संभावनाओं की चर्चा राजनीतिक हलकों में है।

खास तौर पर ऊधमसिंह नगर जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में उम्मीदवार का सामाजिक समीकरण और चुनावी क्षमता पार्टी के लिए बेहद अहम हो सकती है।

हालांकि इन जिलों के सभी विधायकों का टिकट खतरे में है, ऐसा मानना अभी सही नहीं होगा।

कई सीटों पर पुराने विधायक ही रह सकते हैं मजबूत

टिकट बदलने की चर्चाओं के बीच यह भी समझना जरूरी है कि भाजपा सभी सीटों पर बदलाव करने के पक्ष में होगी, ऐसा नहीं है।

जहां मौजूदा विधायक की जनता के बीच मजबूत पकड़ है, संगठन उसके साथ है और सर्वे में जीत की संभावना बेहतर आती है, वहां पार्टी पुराने चेहरे पर ही भरोसा कायम रख सकती है।

यानी संभावित फॉर्मूला कुछ इस तरह हो सकता है—

रिपोर्ट मजबूत = टिकट की संभावना मजबूत

रिपोर्ट कमजोर = टिकट पर पुनर्विचार

नए उम्मीदवार की जीत की संभावना ज्यादा = बदलाव का विकल्प

नए दावेदारों की बढ़ी सक्रियता

जैसे-जैसे 2027 नजदीक आ रहा है, भाजपा के भीतर नए दावेदारों की सक्रियता भी बढ़ रही है।

कई नेता क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रियता बढ़ी है। संगठनात्मक बैठकों में भागीदारी बढ़ी है और संभावित उम्मीदवार अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं।

मौजूदा विधायकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके सामने केवल विपक्ष का उम्मीदवार नहीं होगा, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर टिकट के लिए तैयार हो रहे दावेदार भी होंगे।

50 फीसदी टिकट कटे तो बदल जाएगा पूरा चुनावी गणित

अगर भाजपा वास्तव में अपने करीब आधे मौजूदा विधायकों के टिकट बदल देती है, तो इसका असर सिर्फ उम्मीदवारों की सूची तक सीमित नहीं रहेगा।

इससे कई विधानसभा क्षेत्रों में—

  • पार्टी के अंदर गुटीय समीकरण बदल सकते हैं।
  • नए दावेदारों को बड़ा राजनीतिक अवसर मिल सकता है।
  • पुराने नेताओं में असंतोष पैदा हो सकता है।
  • कुछ सीटों पर बगावत की चुनौती सामने आ सकती है।
  • नए सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण बन सकते हैं।
  • विपक्ष को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है।

यानी एक टिकट बदलने का असर कई सीटों के राजनीतिक समीकरण तक पहुंच सकता है।

क्या धामी सरकार के काम पर ही चुनाव नहीं लड़ेगी BJP?

भाजपा के सामने 2027 में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सवाल यह भी होगा कि चुनाव को सरकार के कामकाज बनाम विपक्ष के रूप में लड़ा जाए या प्रत्येक विधानसभा सीट पर स्थानीय उम्मीदवार की ताकत को प्राथमिकता दी जाए।

अगर पार्टी बड़े पैमाने पर टिकट बदलती है तो इसका सीधा संकेत होगा कि भाजपा सरकार के कामकाज के साथ-साथ स्थानीय एंटी-इनकंबेंसी को भी गंभीरता से ले रही है।

इस रणनीति में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार के काम को चुनावी मुद्दा बनाने के साथ-साथ उन सीटों पर चेहरा बदलने की कोशिश हो सकती है जहां मौजूदा विधायक पार्टी के लिए जोखिम बन सकते हैं।

मौजूदा विधायकों के सामने सबसे बड़ी परीक्षा

पांच साल सत्ता में रहने के बाद किसी विधायक के पास संगठन, सरकार और संसाधनों का लाभ होता है। लेकिन चुनाव में अंतिम फैसला जनता करती है।

अगर पार्टी के सर्वे में जनता की नाराजगी सामने आती है तो केवल विधायक का मौजूदा पद टिकट बचाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

यही वजह है कि भाजपा के कई मौजूदा विधायक अब अपने-अपने क्षेत्रों में जनता और कार्यकर्ताओं के फीडबैक को लेकर ज्यादा सतर्क नजर आ सकते हैं।

अभी आधिकारिक सूची नहीं, अंतिम फैसला बाकी

यहां यह साफ करना बेहद जरूरी है कि भाजपा ने अभी तक 2027 विधानसभा चुनाव के लिए न तो 50 फीसदी टिकट काटने की घोषणा की है और न ही किसी विधायक की आधिकारिक टिकट सूची जारी की है।

टिकट का अंतिम फैसला चुनाव से पहले होने वाले सर्वे, संगठनात्मक रिपोर्ट, संभावित उम्मीदवारों की स्थिति, राजनीतिक परिस्थितियों और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर करेगा।

इसलिए जिन विधायकों के नाम को लेकर राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं, उनके टिकट कटने की बात को अभी अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।

2027 में असली मुकाबला—विपक्ष से पहले टिकट का!

उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव भले ही अभी दूर दिखाई दे रहा हो, लेकिन भाजपा के भीतर टिकट की दौड़ शुरू हो चुकी है।

मौजूदा विधायक अपने टिकट को सुरक्षित रखने के लिए मैदान में सक्रिय हैं तो संभावित दावेदार अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं।

अगर सूत्रों के दावे के मुताबिक भाजपा ने बड़े पैमाने पर चेहरा बदलने का फैसला किया, तो उत्तराखंड की राजनीति में इसका असर बहुत बड़ा हो सकता है।

कई पुराने चेहरे अचानक दौड़ से बाहर हो सकते हैं।

कई नए चेहरों को पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका मिल सकता है।

और कई ऐसी सीटें, जहां मौजूदा विधायक खुद को मजबूत मानकर चल रहे हैं, वहां पार्टी अचानक नया उम्मीदवार उतार सकती है।

2027 में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि भाजपा सत्ता में लौटेगी या नहीं।

सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि भाजपा कितने मौजूदा विधायकों पर दोबारा भरोसा करेगी और कितने चेहरों को जनता के फीडबैक के नाम पर बदल देगी?

फिलहाल भाजपा के अंदर टिकट का खेल शुरू हो चुका है और अगर 50 फीसदी बदलाव की चर्चा सच के करीब पहुंचती है, तो 2027 का सबसे बड़ा सियासी झटका विपक्ष से पहले भाजपा के कई मौजूदा विधायकों को लग सकता है।

दून वैली टाइम्स—उत्तराखंड की राजनीति पर पैनी नजर।

डिस्क्लेमर: इस खबर में टिकट कटने से संबंधित आंकड़े और संभावित बदलाव सूत्रों/मीडिया रिपोर्टों में चल रही चर्चाओं पर आधारित हैं। भाजपा की ओर से अंतिम उम्मीदवार सूची या 50 फीसदी टिकट कटने की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की गई है।

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