हैरान करने वाला आदेश: महिला का सीना दबाना और सलवार उतारने की कोशिश रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई कड़ी नाराजगी

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नई दिल्ली। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले पर गंभीर टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को अधिक संवेदनशील होना चाहिए और कानून व पूर्व न्यायिक फैसलों का गहन अध्ययन करने के बाद ही निर्णय देना चाहिए।

मामला बिहार के बांका जिले से जुड़ा है, जहां एक स्टूडियो संचालक पर युवती को फोटो खींचने के बहाने कमरे में ले जाकर दरवाजा बंद करने, उसका सीना दबाने, सलवार उतारने की कोशिश करने और दुष्कर्म की नीयत से अश्लील हरकतें करने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए तीन वर्ष की सजा सुनाई थी, लेकिन पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2026 को आरोपी को बरी कर दिया। हाईकोर्ट का कहना था कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह सिद्ध नहीं होता कि आरोपी ने रेप करने की दिशा में ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाया, जिसे कानून की दृष्टि में “रेप का प्रयास” कहा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी आपत्ति

14 जुलाई 2026 को सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस फैसले पर हैरानी जताई। अदालत ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों को संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और बिना पर्याप्त कानूनी पड़ताल के ऐसे निर्णय नहीं देने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह पटना हाईकोर्ट के फैसले की विस्तार से समीक्षा करेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की सुनवाई के दौरान उठा मुद्दा

यह मामला उस समय चर्चा में आया जब सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग का स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना अपने आप में रेप का प्रयास नहीं माना जा सकता। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ने पटना हाईकोर्ट के हालिया फैसले का भी उल्लेख किया।

यौन अपराधों पर नई गाइडलाइन को मंजूरी

इसी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी (NJA) की विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार यौन अपराधों की सुनवाई संबंधी संवेदनशीलता गाइडलाइन को मंजूरी देते हुए देश की सभी अदालतों को इसका पालन करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य न्यायाधीशों में पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण विकसित करना और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील बनाना है।

क्या था पूरा मामला?

एफआईआर के अनुसार, 20 जनवरी 2008 को युवती अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने स्टूडियो गई थी। आरोप है कि स्टूडियो संचालक उसे अंदर ले गया, पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा, दरवाजा बंद कर कपड़े उतार दिए तथा युवती की सलवार उतारने और उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया।

वर्ष 2013 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप के प्रयास और अवैध रूप से बंधक बनाने का दोषी मानते हुए तीन वर्ष की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां करीब 13 वर्ष तक चली सुनवाई के बाद उसे बरी कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने किन आधारों पर दी राहत?

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य और उपलब्ध रिकॉर्ड से रेप के प्रयास का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता। अदालत ने जांच में कई खामियों का भी उल्लेख किया। स्वतंत्र गवाह अपने बयान से मुकर गया, जांच अधिकारी और चिकित्सा अधिकारी की गवाही नहीं हुई तथा पीड़िता के बयान में कुछ विरोधाभास पाए गए। इन्हीं आधारों पर आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

रेप की तैयारी और रेप के प्रयास में क्या अंतर?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों में स्पष्ट किया है कि रेप की तैयारी वह अवस्था है, जब अपराध की योजना बनाई जाती है या साधन जुटाए जाते हैं। जबकि रेप का प्रयास तब माना जाता है, जब आरोपी अपराध को अंजाम देने की दिशा में प्रत्यक्ष और ठोस कदम उठा देता है। यदि किसी कारण अपराध पूरा नहीं हो पाता, तब भी ऐसा प्रयास कानून के तहत दंडनीय होता है।

अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले की विस्तृत समीक्षा करेगा और न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़े महत्वपूर्ण दिशानिर्देशों के साथ विस्तृत आदेश जारी कर सकता है।

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