देहरादून के चूना पत्थर की कहानी: व्यापार से पर्यावरणीय संघर्ष तक

देहरादून। देहरादून का चूना पत्थर केवल पहाड़ों से निकला खनिज नहीं, बल्कि इस शहर के इतिहास, व्यापार, रोजगार और सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। कभी देहरादून की पहचान चूना, चावल, चाय और लकड़ी जैसी वस्तुओं से होती थी। पुराने निर्माणों में चूने के इस्तेमाल की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही थी। गुरु राम राय दरबार की दीवारों और देहरादून के कई पुराने निर्माणों में चूने के उपयोग का उल्लेख मिलता है।

नदियों के साथ बहकर आता था चूना पत्थर

देहरादून में शुरुआती दौर में चूना पत्थर किसी व्यवस्थित खदान से नहीं निकाला जाता था। बरसात के मौसम में मसूरी और आसपास की पहाड़ियों से पानी के साथ पत्थर बहकर नदियों और जलधाराओं के जरिए नीचे आते थे। बारिश खत्म होने के बाद स्थानीय लोग नदी और जलधाराओं के सूखे किनारों से इन पत्थरों को एकत्र करते थे।

इन पत्थरों को भट्टों में पकाकर चूना तैयार किया जाता था। धीरे-धीरे निर्माण कार्यों और अन्य जरूरतों के लिए चूने की मांग बढ़ने लगी। इसके साथ ही लोगों का ध्यान उन पहाड़ी क्षेत्रों की ओर गया, जहां चूना पत्थर के बड़े भंडार मौजूद थे।

बिहारी लाल बख्तवार सिंह ने बढ़ाया चूने का कारोबार

चूने के व्यापार को देहरादून से बाहर तक पहुंचाने में बिहारी लाल बख्तवार सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। उन्होंने चूने की आढ़त का काम शुरू किया। उस समय लाहौर सहित कई अन्य क्षेत्रों में चूने के पत्थर की मांग बढ़ रही थी।

मांग बढ़ने के साथ देहरादून का चूना स्थानीय जरूरत की वस्तु न रहकर दूसरे शहरों तक पहुंचने वाला महत्वपूर्ण व्यापारिक उत्पाद बन गया।

उल्लेखनीय है कि बिहारी लाल बख्तवार सिंह वही व्यक्ति माने जाते हैं, जिनके नाम पर देहरादून में चौधरी बिहारी लाल मार्ग का नाम जुड़ा है। खराखेत नमक आंदोलन में भी उनकी अग्रणी भूमिका का उल्लेख मिलता है। इस तरह उनका योगदान केवल व्यापार तक सीमित नहीं था, बल्कि देहरादून के सामाजिक और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से भी जुड़ा रहा।

1900 में रेल आई तो कारोबार ने पकड़ी रफ्तार

सन् 1900 में देहरादून तक रेल पहुंचने के बाद चूने के व्यापार को नई गति मिली। रेल के जरिए चूना और चूना पत्थर दूसरे क्षेत्रों तक भेजना पहले की तुलना में आसान हो गया। परिवहन की सुविधा बढ़ने के साथ चूने के भट्टों और इससे जुड़े व्यापार का भी विस्तार हुआ।

देहरादून और मसूरी की पहाड़ियों से मिलने वाला चूना पत्थर अपनी उच्च गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था। इसकी शुद्धता लगभग 99 प्रतिशत तक बताई जाती थी। इसकी गुणवत्ता और व्यापारिक मांग के कारण चूना उद्योग देहरादून की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान बनाने लगा।

1937 के बाद व्यवस्थित हुआ खनन

सन् 1937 में मसूरी के भट्ठा गांव के ढूंडी क्षेत्र में चूने की खान मिलने के बाद चूना पत्थर के खनन का काम और व्यवस्थित हुआ। इस खान पर अल्लाउद्दीन नामक ठेकेदार का लंबे समय तक अधिकार रहा।

समय के साथ देहरादून-मसूरी क्षेत्र में चूना निकालने का काम बढ़ता गया। स्वतंत्रता के समय तक देहरादून का चूना उद्योग काफी प्रसिद्ध हो चुका था। इसकी गुणवत्ता और आर्थिक महत्व के कारण इसे ‘मैकेनाइज्ड गोल्ड’ तक कहा जाने लगा।

विभाजन के बाद बढ़ा खनन का दबाव

देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए कई अनुभवी और पारखी लोगों ने भी चूने के कारोबार में भागीदारी शुरू की। इसके बाद खनन की गतिविधियां तेजी से बढ़ीं।

चूना पत्थर निकालने के लिए पहाड़ियों में सड़कें बनाई जाने लगीं। ट्रकों की आवाजाही बढ़ी और चट्टानों को तोड़ने के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल होने लगा। खनन का दायरा बढ़ने के साथ पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना पर भी इसका असर दिखाई देने लगा।

बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई। पहाड़ियों की ढलानों को काटा गया और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था प्रभावित हुई। बरसात के दौरान खनन क्षेत्रों से मलबा नीचे आने लगा। भूस्खलन की घटनाओं और जलस्रोतों पर पड़ने वाले प्रभाव ने पर्यावरण को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी।

पर्यावरण बनाम रोजगार की बड़ी चुनौती

चूना खनन से जहां व्यापारियों, ठेकेदारों और खदान मालिकों को आर्थिक लाभ मिला, वहीं बड़ी संख्या में स्थानीय श्रमिक भी इससे जुड़े हुए थे। खदानों में काम करने वाले मजदूरों के अलावा परिवहन, भट्टों, ढुलाई और अन्य गतिविधियों से जुड़े लोगों की आजीविका भी इसी उद्योग पर निर्भर थी।

इसलिए चूना खनन का इतिहास केवल खनिज निकालने और व्यापार बढ़ने की कहानी नहीं है। यह उन हजारों लोगों की रोजी-रोटी से भी जुड़ा रहा, जिनके परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस कारोबार पर निर्भर थे।

1985 में पहुंचा सुप्रीम कोर्ट तक मामला

लगातार बढ़ते पर्यावरणीय नुकसान के बीच सन् 1985 में देहरादून के चूना खनन का मामला सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में आया। खनन के कारण जंगलों, पहाड़ों, जलस्रोतों और प्राकृतिक पर्यावरण को हो रहे नुकसान को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप हुआ।

मामले के बाद देहरादून-मसूरी क्षेत्र की कई चूना खदानों को बंद करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

अंततः सन् 1988 में देहरादून की चूना खदानें जिलाधिकारी, देहरादून के अधिकार क्षेत्र में चली गईं। इसके साथ ही देहरादून-मसूरी क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे बड़े पैमाने के चूना खनन के दौर का अंत हुआ।

खदानें बंद हुईं तो मजदूरों की जिंदगी भी बदली

चूना खदानों को बंद करने का फैसला पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। खदानों के बंद होने के बाद उन श्रमिकों और कामगारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया, जिनकी वर्षों से आजीविका इसी उद्योग से जुड़ी थी।

कई परिवारों की आय का मुख्य स्रोत समाप्त हो गया। लोगों को रोजगार के दूसरे साधन तलाशने पड़े। कुछ लोगों ने दूसरे क्षेत्रों में जाकर काम की तलाश की। इस तरह चूना खदानों का बंद होना देहरादून के स्थानीय समाज और अर्थव्यवस्था में भी बड़ा बदलाव लेकर आया।

पर्यावरण बचा, लेकिन पुनर्वास का सवाल पीछे रह गया

चूना खनन के खिलाफ न्यायिक हस्तक्षेप का मूल केंद्र पर्यावरण, जंगल, जलस्रोतों और पहाड़ों को हो रहे नुकसान को रोकना था। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से खदानों को बंद किया जाना ऐतिहासिक कदम माना गया।

लेकिन इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा रहा कि खनन पर निर्भर श्रमिकों और उनके परिवारों के दीर्घकालिक रोजगार तथा पुनर्वास की व्यवस्था किस तरह हो। खदानों के बंद होने के बाद प्रभावित लोगों की आजीविका का सवाल उतनी प्रमुखता से सामने नहीं आया, जितना पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा।

देहरादून के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय

आज जब देहरादून तेजी से बदलते शहर के रूप में पहचाना जाता है, तब इसके अतीत में चूना उद्योग की भूमिका को याद करना जरूरी है। कभी नदियों के किनारों से पत्थर चुनकर चूना बनाने की परंपरा से शुरू हुआ यह काम एक बड़े व्यापारिक उद्योग में बदल गया।

रेल आने से व्यापार बढ़ा, खदानों के व्यवस्थित होने से उत्पादन बढ़ा, हजारों लोगों को रोजगार मिला और देहरादून का चूना दूर-दराज के बाजारों तक पहुंचा। लेकिन बढ़ते खनन ने पहाड़ों, जंगलों और जलस्रोतों पर दबाव भी बढ़ाया। अंततः पर्यावरण संरक्षण की चिंता ने इस उद्योग के बड़े हिस्से को बंद कराने की दिशा तय की।

इसलिए देहरादून की चूना खदानों का इतिहास हमें एक साथ विकास, व्यापार, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक बदलाव की कहानी बताता है। यह इतिहास केवल बंद हो चुकी खदानों का इतिहास नहीं, बल्कि उस दौर में जीने वाले श्रमिकों, व्यापारियों और स्थानीय समाज की भी कहानी है।

About The Author