सगे मामा ने किया नाबालिग भांजी से दुष्कर्म, गर्भवती होने पर डीएनए जांच में खुली सच्चाई

Listen to this article

दूसरों का नाम लेने का बनाया दबाव, पोक्सो अदालत ने सुनाई 20 साल कठोर कारावास की सजा

बागेश्वर। रिश्तों को शर्मसार करने वाले बहुचर्चित मामले में बागेश्वर की विशेष पोक्सो अदालत ने सगे मामा को अपनी करीब 17 वर्षीय नाबालिग भांजी से दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोष सिद्ध होने के बाद जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को राज्य की पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत पीड़िता को 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए हैं।

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता बचपन से अपने नाना-नानी के घर रह रही थी। वर्ष 2024 में पेट दर्द की शिकायत पर कराई गई चिकित्सकीय जांच में पता चला कि वह तीन माह की गर्भवती है। शुरुआत में पीड़िता ने कुछ अन्य लोगों के नाम लिए, लेकिन बाद में बाल कल्याण समिति की काउंसलिंग और न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान में उसने अपने सगे मामा पर दुष्कर्म का आरोप लगाया। पीड़िता ने बताया कि आरोपी ने ही उसे सच्चाई छिपाने और दूसरे लोगों के नाम लेने के लिए दबाव बनाया था।

डीएनए रिपोर्ट बनी सबसे बड़ा वैज्ञानिक साक्ष्य

मामले की जांच के दौरान पुलिस ने पीड़िता, भ्रूण और आरोपी के डीएनए नमूने फॉरेंसिक साइंस लैब भेजे। एफएसएल की रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि आरोपी ही भ्रूण का जैविक पिता है। विशेष पोक्सो अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि डीएनए रिपोर्ट इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक वैज्ञानिक साक्ष्य है, जिसने अभियोजन के पूरे घटनाक्रम की पुष्टि कर दी।

नाबालिग होने से सहमति का कोई सवाल नहीं

अदालत ने विद्यालयी अभिलेखों और हाईस्कूल प्रमाणपत्र के आधार पर पीड़िता की जन्मतिथि 23 मई 2007 स्वीकार की। घटना के समय उसकी आयु 16 वर्ष 9 माह थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधि के अनुसार वह नाबालिग थी, इसलिए किसी भी प्रकार की कथित सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है।

रिश्ते और विश्वास का किया दुरुपयोग

विशेष सत्र न्यायाधीश (पोक्सो) पंकज तोमर ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ने पारिवारिक रिश्ते और विश्वास का घोर दुरुपयोग करते हुए जघन्य अपराध किया। इस घटना का पीड़िता के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे अपराध समाज में बालिकाओं की सुरक्षा और पारिवारिक विश्वास को गंभीर रूप से कमजोर करते हैं।

20 साल कठोर कारावास, 5 लाख रुपये प्रतिकर

सजा तय करते समय अदालत ने यह भी माना कि आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं था और उसने मुकदमे के दौरान सहयोग किया। इसके बावजूद न्यायालय ने कहा कि अपराध की गंभीरता किसी भी प्रकार की नरमी की अनुमति नहीं देती। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(च) तथा पोक्सो अधिनियम की धारा 5/6 के तहत दोषी करार देते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई और पीड़िता को 5 लाख रुपये का प्रतिकर दिलाने के निर्देश दिए।

About The Author