किशाऊ बांध के विरोध में संघर्ष समिति ने एसडीएम को सौंपा ज्ञापन

क्वानू के ग्रामीणों ने उठाई जमीन, आजीविका और पुश्तैनी विरासत बचाने की मांग; कहा—प्रभावित लोगों की आवाज सुने प्रशासन

कालसी। प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर क्वानू और आसपास के क्षेत्रों में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। किशाऊ बांध संघर्ष समिति, क्वानू की ओर से तहसील कार्यालय कालसी में एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर प्रशासन के सामने ग्रामीणों की आपत्तियां और चिंताएं रखी गईं।

संघर्ष समिति ने कहा कि परियोजना को लेकर किसी भी निर्णय में प्रभावित ग्रामीणों की आवाज, उनकी जमीन, आजीविका, पुनर्वास और सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। समिति ने स्पष्ट किया कि जनता से संवाद और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी।

15 सितंबर को छह राज्यों ने किया समझौता

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर 15 सितंबर 2026 को उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। केंद्र सरकार के अनुसार परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया है और इसकी करीब 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार तथा शेष 10 प्रतिशत राशि सहभागी राज्यों द्वारा वहन की जाएगी। 

सरकारी जानकारी के मुताबिक टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा बांध प्रस्तावित है। परियोजना में करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडारण की क्षमता बताई गई है। सरकार के अनुसार इससे 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है। 

भूमि और पुनर्वास को लेकर ग्रामीणों में चिंता

परियोजना को लेकर स्थानीय ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता पुश्तैनी जमीन और गांवों के भविष्य को लेकर है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी परियोजना से प्रभावित परिवारों के उचित एवं सम्मानजनक पुनर्वास को प्राथमिकता बताते हुए कहा है कि परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में वन भूमि की आवश्यकता होगी और क्षतिपूरक वनीकरण भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। 

क्वाणू क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि उनके लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि रोजगार, आजीविका, संस्कृति, परंपरा और पीढ़ियों की विरासत है। ग्रामीणों की मांग है कि परियोजना से प्रभावित होने वाली भूमि और परिवारों को लेकर सभी पहलुओं की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक की जाए।

“क्वानू सिर्फ नक्शे पर एक बिंदु नहीं”

किशाऊ बांध संघर्ष समिति का कहना है कि क्वानू उनकी जन्मभूमि है। खेत-खलिहान, घर, देवी-देवताओं से जुड़े स्थल, सामाजिक परंपराएं और ग्रामीणों की पीढ़ियों की यादें इसी भूमि से जुड़ी हैं।

समिति का कहना है कि विकास परियोजनाओं के लाभों के साथ-साथ प्रभावित लोगों के भूमि अधिकार, पुनर्वास, आजीविका और सांस्कृतिक अस्तित्व पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

किशाऊ परियोजना के समझौते के बाद क्वानू और आसपास के गांवों में विरोध प्रदर्शन भी सामने आए हैं। स्थानीय ग्रामीणों ने परियोजना से अपनी जमीन और पुश्तैनी घरों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। 

संघर्ष समिति की मांग

किशाऊ बांध संघर्ष समिति ने प्रशासन के माध्यम से सरकार से मांग की है कि—

  • प्रभावित ग्रामीणों की आपत्तियों को गंभीरता से सुना जाए।
  • परियोजना से प्रभावित भूमि और परिवारों की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक की जाए।
  • प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे की नीति स्पष्ट की जाए।
  • ग्रामीणों की आजीविका और कृषि भूमि की सुरक्षा पर ठोस पहल हो।
  • पर्यावरण और सामाजिक प्रभावों का पारदर्शी तरीके से आकलन किया जाए।
  • क्वानू सहित प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के साथ व्यापक संवाद किया जाए।

संघर्ष समिति ने कहा कि वह क्वानू की जमीन, आजीविका और पहचान से जुड़े मुद्दों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाती रहेगी।

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