जौनसार-बावर के हक-हकूकदारों की लड़ाई रंग लाई

विधानसभा में गूंजा माफी की लकड़ी का मुद्दा, 1,895.297 घनमीटर लंबित हक-हकूक के वितरण का रास्ता साफ

मार्च के भराड़ीसैंण सत्र में चकराता विधायक प्रीतम सिंह ने उठाया था मामला, 150 वर्षों से चले आ रहे पारंपरिक अधिकारों से वंचित न करने की मांग

देहरादून/चकराता। जौनसार-बावर के हक-हकूकदारों के वर्षों पुराने अधिकारों से जुड़ी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। पिछले तीन वर्षों से लंबित माफी की लकड़ी के मामले को चकराता विधायक प्रीतम सिंह ने विधानसभा के बजट सत्र में प्रमुखता से उठाया था। अब चकराता वन प्रभाग में 1,895.297 घनमीटर लंबित हक-हकूक के वितरण का प्रस्ताव तैयार होने से क्षेत्र के लोगों में उम्मीद जगी है।

9 से 13 मार्च 2026 तक भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में आयोजित विधानसभा सत्र के दौरान प्रीतम सिंह ने जौनसार-बावर के लोगों के पारंपरिक वन अधिकारों का मुद्दा सदन में उठाते हुए सरकार से मांग की थी कि वर्षों से चली आ रही हक-हकूक की व्यवस्था को बाधित न किया जाए और पिछले तीन वर्षों से लंबित माफी की लकड़ी हक-हकूकदारों को उपलब्ध कराई जाए।

150 वर्षों पुरानी परंपरा का सदन में हवाला

विधानसभा में विधायक प्रीतम सिंह ने कहा था कि जौनसार-बावर में माफी की लकड़ी मिलने की व्यवस्था कोई नई प्रक्रिया नहीं है। यह क्षेत्र में करीब 150 वर्षों से चली आ रही पारंपरिक व्यवस्था है।

उन्होंने वर्ष 1877 के वाजिब-उल-अर्ज का हवाला देते हुए कहा कि जौनसार-बावर में जंगलों और स्थानीय लोगों के अधिकारों से संबंधित व्यवस्थाएं ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज हैं। विधायक ने पन्नालाल सेटलमेंट का भी उल्लेख करते हुए कहा कि बंदोबस्त के दौरान क्षेत्र के खतवासियों के जंगल संबंधी अधिकारों, उनकी प्रकृति, विस्तार और रियायतों का निर्धारण किया गया था।

49 खतों के अधिकारों का रिकॉर्ड

सदन में प्रीतम सिंह ने जौनसार-बावर के 49 खतों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे संबंधित अधिकारों और व्यवस्थाओं का रिकॉर्ड वाजिब-उल-अर्ज में दर्ज है। उनका कहना था कि ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज पारंपरिक अधिकारों को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया के चलते बाधित नहीं किया जाना चाहिए।

तीन साल से लंबित है माफी की लकड़ी

पिछले तीन वर्षों से माफी की लकड़ी का वितरण लंबित होने के कारण क्षेत्र के ग्रामीणों में नाराजगी बनी हुई है। इस मुद्दे को लेकर स्थानीय स्तर पर भी समय-समय पर आवाज उठती रही है।

विधायक ने विधानसभा में यह भी कहा था कि जौनसार-बावर की सामाजिक एवं पारंपरिक व्यवस्था में अंतिम संस्कार के लिए देवदार की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में माफी की लकड़ी का मामला महज वन उपज के वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है।

विधानसभा में आंदोलन की चेतावनी, अब प्रस्ताव से जगी उम्मीद

प्रीतम सिंह ने सदन में सरकार को चेताया था कि यदि जौनसार-बावर के पारंपरिक हक-हकूक बहाल नहीं किए गए तो क्षेत्र में आंदोलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने सरकार से मामले का समयबद्ध समाधान करने की मांग की थी।

अब 1,895.297 घनमीटर लंबित हक-हकूक के वितरण का प्रस्ताव तैयार होने को इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, प्रस्ताव के बाद अंतिम स्वीकृति और वास्तविक वितरण की प्रक्रिया पूरी होना अभी बाकी है।

इसी वित्तीय वर्ष में वितरण की मांग

चकराता विधायक ने सरकार से मांग की है कि पिछले तीन वर्षों से लंबित माफी की लकड़ी का वितरण इसी वित्तीय वर्ष में कराया जाए, ताकि हक-हकूकदारों को उनका पारंपरिक अधिकार मिल सके और क्षेत्र में लंबे समय से बनी नाराजगी दूर हो।

अब जौनसार-बावर के लोगों की निगाहें सरकार और वन विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। 1,895.297 घनमीटर के प्रस्ताव के बाद उम्मीद बढ़ी है कि वर्षों से लंबित हक-हकूक का वितरण जल्द धरातल पर उतर सकता है।

— दून वैली टाइम्स

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